सीएए पर भ्रम फैलाकर डराया जा रहा है


प्रकाश जावडेकर

देश भर में नागरिकता कानून के संबंध में चर्चा चल रही है और गलतफहमी के शिकार लोग आंदोलन पर उतर आए हैं। कुछ राजनीतिक दल और मोदी विरोधी इसे अवसर मानकर लोगों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए वास्तविकता साफ करना जरूरी है। सबसे पहले यह साफ होना चाहिए कि नागरिकता संशोधन बिल-2019 और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ये दो अलग विषय हैं। आज इन दोनों विषयों को मिला कर अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। लोगों में झूठा डर पैदा किया गया है कि अब इन सारे कदमों से मुसलमानों का संरक्षण समाप्त हो जाएगा और उन्हें बाहरी घोषित किया जाएगा। इससे बड़ा झूठ राजनीति में आज तक कभी भी मंडित नहीं किया गया।

गांधी, नेहरू और पटेल

आइए नागरिकता संशोधन बिल को समझें। बांग्लादेश और पाकिस्तान दोनों विभाजन के समय भारत का हिस्सा थे और अफगानिस्तान पहले से विशाल भारत का हिस्सा रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की निर्मिति मजहब के आधार पर हुई और अनेक अल्पसंख्यक मुसलमान बांग्लादेश और पाकिस्तान में गए। उसी दौरान वहां से हिंदू बड़ी संख्या में भारत आए। शरणार्थियों को भारत में बसाया गया। उस समय महात्मा गांधी ने कहा था, ‘एक ही भारत के अब दो टुकड़े हुए हैं। भारत में आए हुए लोगों को नागरिकता देना हमारा कर्तव्य है।’ यही बात पंडित नेहरू और सरदार पटेल ने भी कही। उस समय भारत आए लाखों शरणार्थियों को नागरिकता भी दी गई। आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तीनों घोषित इस्लामिक देश हैं। इसलिए वहां मुसलमानों की धार्मिक प्रताड़ना का सवाल नहीं उठता।

भारत में देश का मजहब कोई पंथ नहीं बल्कि संविधान है। इसलिए हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी शरणार्थियों को नागरिकता देने की नीति भारत ने सदा अपनाई है। साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पहली दफा इसे कानूनी जामा पहनाया और साफ किया कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से जो हिंदू शरणार्थी आएंगे उन्हें नागरिकता दी जाएगी। आश्चर्य की बात है कि आज आंदोलन करने वाले अनेक दल उस समय अटल जी की इस पहल का समर्थन कर रहे थे। उसके बाद 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में मनमोहन सरकार बनी। उसने संसद में इसी बिल को फिर से पारित करके उसकी समायावधि 1 साल के लिए बढ़ा दी। 2005 में इस कानून की वैधता 1 साल और बढ़ाई गई। उस समय उनके साथी कम्युनिस्ट, तृणमूल कांग्रेस और वे सभी दल थे जो आज इसके विरोध में बोल रहे हैं।
2003 का कानून केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिंदुओं की बात करता है। आज का कानून हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसी सबकी बात करता है जिनकी धार्मिक प्रताड़ना होती आ रही है। अभी 2019 में मोदी सरकार जो नागरिकता संशोधन कानून लाई है, वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रहने वाले उन धार्मिक समुदायों के लिए है जो प्रताड़ना के शिकार होते हैं। ऐसे हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी और बौद्ध पंथों के शरणार्थियों को नागरिकता देने की व्यवस्था इस कानून में है। यह पहले से ज्यादा व्यापक है। वास्तव में, सभी पार्टियों को इसका स्वागत करना चाहिए था, लेकिन राजनीति के कारण आज कुछ विपक्षी दल 2004 और 2005 में ली गई भूमिका के विपरीत खड़े होते दिखाई दे रहे हैं। यह पाखंड है।

एक प्रश्न आज लोग पूछते हैं कि मुसलमानों के साथ भेदभाव क्यों। इसका उत्तर है कि मुसलमान के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है और न होगा। आज देश के जो नागरिक हैं उनमें से एक भी मुसलमान को कोई तकलीफ या असुविधा नहीं होगी और न उसकी देशभक्ति पर कोई आशंका उठेगी। यह प्रश्न भारत के नागरिकों का है ही नहीं। इसका संबंध तीन देशों से आए हुए शरणार्थियों से है। चूंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इस्लामिक देश हैं, वहां मुस्लिम समाज को धार्मिक प्रताड़ना का शिकार नहीं बनना पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री के एक सवाल का जवाब एक भी राजनीतिक दल ने नहीं दिया है। क्या इन तीन देशों के मुसलमानों को भारत आने की खुली छूट देनी चाहिए। 30 करोड़ आबादी को भारत की नागरिकता देने के लिए क्या विपक्ष तैयार है और क्या यह उचित है।

दुनिया में कोई भी देश नागरिकता आसानी से नहीं देता। हर देश के अपने कानून हैं और हर देश में अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाता है। यह दुनिया का रिवाज है। भारत ने भी वही नीति अपनाई तो उस पर आपत्ति करते हैं। और अभी तो एनआरसी की रूपरेखा भी सामने नहीं आई है। अभी से विवाद पैदा करना दुर्भाग्यपूर्ण और राजनीति से प्रेरित है। आधार कार्ड की शुरुआत हुई तो कई लोग कहते थे कि गरीब कहां से कागज लाएगा। पहचान कैसे बताएगा। कहां से प्रक्रिया पूरी कर सकेगा। आज 10 साल बाद हम देख रहे हैं कि भारत के लगभग सभी नागरिकों ने आधार कार्ड प्राप्त कर लिया है। आशंका उठाने वालों से ज्यादा होशियारी से सामान्य जनता काम करती है, यही इसका अर्थ है। अभी केवल नागरिकता संशोधन कानून आया है। एनआरसी की केवल चर्चा है, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत के 130 करोड़ नागरिकों में से एक नागरिक को भी एनआरसी से बाहर नहीं रखा जाएगा और किसी को भी डरने की या संभ्रमित होने की जरूरत नहीं है।

नाकारा सोच

आज जिस तरह से जान-बूझकर कुछ तत्व हिंसा फैला रहे हैं, उसका तथ्य भी जल्दी सामने आएगा। मोदी जी की ऐतिहासिक दूसरी बार जीत, ट्रिपल तलाक बिल, अयोध्या मसले का शांतिपूर्ण समाधान, धारा-370 का रद्द होना, इन सबमें विपक्ष कुछ कर नहीं पाया। वह गुस्सा उनके मन में ठूंस-ठूंस कर भरा था। अब एक संभ्रम पैदा करने का अवसर मिला तो उसी का फायदा विपक्षी दल उठाना चाहते हैं। लेकिन देश में ऐसी नाकारा सोच की राजनीति सफल नहीं होती है।

(लेखक केंद्रीय मंत्री हैं)
साभार- नवभारत टाइम्स