नागरिकता संशोधन अधिनियम – क्या यह नैतिक है? क्या यह संवैधानिक है? नहीं, यह दोनों का समावेश है!


धर्मेंद्र प्रधान

छोटी-सी “नागरिकता” का जन्म यमुना नदी के तट पर बसी उत्तरी दिल्ली की कॉलोनी मजनूं का टीला के जर्जर हो चुके एक शरणार्थी शिविर में हुआ था। उसके माता-पिता पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न से बचने के लिए यहां आ गए थे। उन्होंने नागरिकता विधेयक पारित होने के बाद अपनी बच्ची का नाम नागरिकता रखा, जो उनके लिए एक गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को संभव बनाता है। इस परिवार के लिए नागरिकता विधेयक फिर से अपनी खोई हुई पहचान पाने का एक अवसर है, ऐसे अधिकार जो इनको इनके देश में प्राप्त नहीं थे।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के पारित होने के बाद से चली आ रही अफवाह, उथल-पुथल और उन्माद की पृष्ठभूमि में कई प्रासंगिक प्रश्न उठाए जा रहे हैं: पहला, क्या उत्पीड़न, विशेष रूप से कुछ देशों में धर्म के आधार पर, एक वास्तविकता है या नहीं? दूसरा, क्या भारत जैसी समृद्ध सभ्यता वाले देश को ऐसे भेदभाव का सामना करने वाले लोगों के दर्द को कम करना चाहिए? अंत में, जिस तरह से सीएए अपने अस्तित्व में आया है, वह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है? यदि इन सभी का उत्तर सकारात्मक हैं, तो इसको लेकर जो शोरगुल मचाया जा रहा है वह केवल राजनीति से प्रेरित है।
जब भारतीय संसद नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) पर बहस कर रही थी, तो अमेरिकी विदेश विभाग ने एक रिपोर्ट जारी कर पाकिस्तान को फिर से एक बार उस सूची में स्थान दिया, जिन देशों में धार्मिक स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन हो रहा हैं। इसके अतिरिक्त, हाल ही में यूरोपीय संसद द्वारा पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर जारी एक रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों और महिलाओं की दुर्दशा को दर्शाया गया है। उनमें से कई, विशेष रूप से हिंदू भारत में शरण लेने के लिए वहां से भाग रहे हैं। यह तथ्य भी ध्यान में रखना होगा कि सीएए में शामिल सभी तीन देश एक धर्म विशेष के आधार पर शासित राष्ट्र हैं।

दूसरा सवाल यह है कि अगर धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोग भारत की भूमि में शरण लेना चाहते हैं, तो भारत के सामने क्या विकल्प हैं? दरअसल, सीएए उस विचार का उन्नत स्वरूप है जो 1950 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने हॉब्स को संदर्भित करते हुए कहा था, “पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए जीवन बुरा, क्रूर और छोटा हो गया है।” भारत सिख, जैन और बौद्ध जैसे कुछ महान धर्मों का जन्मस्थान रहा है। भारतीय लोकाचार ने धर्म, संप्रदायों और परंपराओं की विभिन्न धाराओं को आत्मसात किया है।
अंत में, नागरिकता का स्थायी कानून बनाने का अधिकार संसद को दिया गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता के अधिकार के प्रावधानों को सीएए पूरा करता है या नहीं। अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि “राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा” और अनुच्छेद 14 में विशेष वर्गीकरण इसके दो प्रमुख उद्देश्यों की पूर्ति के साथ ही किया जा सकता है, जिसमें तर्कसंगत और समझदार वर्गीकरण जो अपेक्षित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किया जाए, शामिल है। न्यायिक निर्णयों की शृंखला इस बात पर भी जोर देती है कि ऐसा करते वक्त संविधान की भावना का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

सीएए के उद्देश्य और कारणों को गृहमंत्री अमित शाह द्वारा स्पष्ट रूप से रखा गया था। भारत के साथ सीमा साझा करने वाले सात देशों में से केवल तीन देशों के लिए ही ऐसा प्रावधान किया गया है, क्योंकि इन तीनों देशों में शासन एक धर्म विशेष के आधार पर चलाया जा रहा है। इस प्रकार, द्विपक्षीय संबंधों के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है। ऐतिहासिक रूप से भी भारत की सीमाओं में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से पलायन होता रहा है। धर्म के आधार पर उत्पीड़न का सामना करने वाले समुदाय अपने यात्रा दस्तावेजों की अवधि समाप्त होने या अपूर्ण या कोई दस्तावेज नहीं होने के बाद भी भारत में शरण लेने के लिए आते रहे हैं। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में इन प्रवासियों को पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 और विदेशियों अधिनियम, 1946 के प्रतिकूल दंडात्मक परिणामों से छूट दी हुई थी और 2016 में भी उन्हें दीर्घकालिक वीजा के लिए पात्र बनाया गया था। सीएए, बस इन उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता के लिए आवेदन देने के लिए सशक्त बनाना चाहता है।

इस बात पर भी बहस चल रही है कि क्या सीएए संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को समान

और स्वतंत्र रूप से किसी भी धर्म को अपनाने, उसका अनुसरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। सीएए इन प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता है- एक तथ्य, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों मे वक्त किया है कि कैब को लाने से न तो अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, न ही भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और परंपराओं पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा।

नागरिकता संशोधन अधिनियम एक ऐतिहासिक गलत को सही करता है और उन हजारों परिवारों को संबल प्रदान करता है, जो विभाजन के वर्षों बाद भी इसके आघात को झेल रहे हैं, जबकि उनके समकक्ष इस उप-महाद्वीप के अधिकांश लोग अपने जीवन में आगे बढ़ चुके है। ऐसा करना, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के उस दृष्टिकोण को भी पूरा करता है, जिसमें वह एक ऐसे देश की परिकल्पना करते हैं, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने उज्ज्वल भविष्य की दिशा में काम करने में सक्षम हो सकें। यह उन लोगों की न्याय और गरिमा को सुरक्षित करता है जिन्होंने उप-महाद्वीप में धार्मिक उत्पीड़न का सामना किया है। यह समावेशिता की भारतीय परंपरा को पुष्ट करता है।

यह उन लोगों को संरक्षित करने वाला एक ऐतिहासिक कदम है जो पीढ़ियों से पीड़ित हैं। सड़कों पर हिंसा और अशांति फैलाने वाले नेताओं के लिए इस बात को याद रखना जरूरी है जो स्वामी विवेकानंद ने 1883 में अपने प्रसिद्ध धर्म संसद भाषण में कही थी: “मुझे अपने देश पर गर्व है जो समूची पृथ्वी पर सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए शरणार्थियों को शरण देता है।” सीएए कई मायनों में इन आकांक्षाओं को पूरा करता है।

          (लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हैं।)