जनतंत्र और राजनीतिक दल


 -दीनदयाल उपाध्याय

धिकांश भारतीय जनता जनतांत्रिक जीवन की आकांक्षी है; किंतु इधर अनेक एशियाई देशों में जनतांत्रिक सरकारों की विफलता या उनके दबा दिए जाने के कारण भारत में बहुत से लोग देश में जनतंत्र के भविष्य के बारे में आशंकित हो उठे हैं। आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों के बिगड़ते जाने के कारण कठिन स्थिति का सफलतापूर्वक सामना कर सकने की जनतंत्र की क्षमता के बारे में भी लोगों के मन में संदेह पैदा हो गया है। ऐसे अनेक लोग हैं, जो ‘जो कुछ अपने पास नहीं है उसके लिए तरसते हैं’ और अविवेकपूर्ण ढंग से वैकल्पिक स्वरूपों की सरकार की स्थापना की आकांक्षा करते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो जनतंत्र में दृढ़ विश्वास के साथ भारत के वर्तमान जनतांत्रिक ढांचे को ब्रिटिश संसदीय जनतंत्र के बाहरी रूपों का एक घटिया अनुकरण मानते हैं। वे चाहते हैं कि यदि सच्चे जनतंत्र के लक्ष्य की प्राप्ति करनी है, तो संवैधानिक और राजनीतिक व्यवस्था अलग ढंग से गठित की जानी चाहिए।

जनतांत्रिक पद्धति के रूपों और औपचारिकताओं का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो सकता है, परंतु इस पद्धति के सफल होने की आशा करने के पूर्व कतिपय ऐसी अनिवार्यताएं भी हैं, जिनके बारे में गारंटी दी जानी चाहिए। उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन’ ने उड़ीसा विधानमंडल के नए भवन का उद्घाटन करते हुए अपने भाषण में इन अनिवार्य पूर्वावश्यकताओं की ओर ठीक ही ध्यान आकृष्ट किया है। उन्होंने कहा है कि किसी भी देश में अनुशासित राजनीतिक दल और निष्ठावान तथा देशभक्त नेतृत्व संसदीय जनतंत्र की सफलता के अपरिहार्य अंग हैं। उन्होंने जनतंत्र को सफल बनाने के लिए स्वतंत्र समाचार-माध्यम (प्रेस), स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वच्छ एवं सक्षम प्रशासन को भी आवश्यक बताया।

फिर भी, चूंकि जनतांत्रिक सरकार में अंतिम अधिकार निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास रहता है, अन्य किसी भी बात से उनका अधिक महत्त्व है, क्योंकि जब तक जनता प्रकट विद्रोह के लिए तैयार न हो, समाचार-पत्र (प्रेस), न्यायपालिका और प्रशासन को अनुचित उपायों से सत्तारूढ़ दल की इच्छाओं के सामने झुकने के लिए विवश किया जा सकता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाचार-पत्रों का मुंह बंद किया जा सकता है, न्यायपालिका के न्यायिक निर्णयों को निष्फल बनाने के लिए विधान में संशोधन कर उसे दुर्बल बनाया जा सकता है और प्रशासन को शीर्षस्थ भ्रष्ट नेताओं द्वारा भ्रष्ट बनाया जा सकता है। इसलिए यदि हम देश के कार्यकलाप में सुधार चाहते हैं, तो हमें सर्वप्रथम राजनीतिक दलों की ओर ध्यान देना होगा।

जहां तक भारत के राजनीतिक दलों का संबंध है, उनमें बहुत सी त्रुटियां हैं। इसमें सबसे दोषी सत्तारूढ़ दल (कांग्रेस) है, परंतु अन्य अनेक दलों का आचरण भी कुछ अच्छा नहीं है। आज राजनीतिक दल सैद्धांतिक आधार पर नहीं, वरन् व्यक्तिगत या गुट के आधार पर गठित होते हैं। इस संबंध में डॉ. राधाकृष्णन कहते हैं, ‘राजनीति’ अंततः साध्य तक पहुंचने का एक साधन है। यह ऐसी व्यवस्था का निरूपण करती है, जिसके द्वारा सबको सामाजिक और आर्थिक न्याय मिले। यदि जनतंत्र केवल यहीं तक अपनी गतिविधियां सीमित रखता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि केवल सत्ता की होड़ में लगे रहें और पद के पीछे दौड़ते रहे तथा राज्य के कार्यों को इस प्रकार छोड़ दें कि वह अस्त-व्यस्त हो जाए तो वह जनतंत्र नाम के लिए भी अच्छा नहीं।” आज राजनीति साधन नहीं रह गई है। वह स्वयं साध्य बन गई है। आज हमारे बीच ऐसे लोग विद्यमान हैं, जो निश्चित सामाजिक और राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति करने की दृष्टि से राजनीतिक सत्ता पर ध्यान देने की अपेक्षा केवल सत्ता के लिए होड़ में अधिक व्यस्त हैं। यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दल जनता को सुसंगठित बनाने और अव्यवस्था में से व्यवस्था का निर्माण करने के स्थान पर वर्तमान अव्यवस्था में केवल और वृद्धि करते हैं। अपने पास आने वाले लोगों के दृष्टिकोणों की कोई चिंता न करते हुए वे केवल इस बात की ओर ही ध्यान देते हैं कि उनके अनुयायियों की संख्या बढ़े।

भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों को अपने लिए एक दर्शन (सिद्धांत या आदर्श) का क्रमिक विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकत्र आने वाले लोगों का समुच्चय मात्र नहीं बनना चाहिए। उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या ज्वॉइंट स्टॉक कंपनी (Joint Stock Company) से अलग प्रकार का होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि दल का दर्शन केवल उसके घोषणा-पत्र के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए। सदस्यों को उसे समझना चाहिए और कार्यरूप में परिणत करने के लिए निष्ठापूर्वक जुट जाना चाहिए।

किंतु हर आदर्श, किसी दल को जनतंत्र का युग लाने में समर्थ नहीं बनाएगा। वह आदर्श स्वयं जनतंत्र के आदर्शों और भावनाओं के विपरीत नहीं होना चाहिए। वस्तुतः अनेक देशों में ऐसे लोगों के हाथ से जनतंत्र को बड़ी क्षति उठानी पड़ी है, जिन्होंने जनतंत्र का उपयोग केवल उसे विनष्ट कर देने के लिए किया। कम्युनिस्टों के पास एक विचारधारा है और वे जनतांत्रिक मार्ग के अनुसरण का दावा करते हैं- केवल अंततः जनतंत्र का अंत कर देने के लिए। डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में- “व्यक्ति के सम्मान और उसकी स्वतंत्रता का सिद्धांत जनतंत्र का मूलभूत सिद्धांत है। मानवता के इतिहास में मनुष्य की स्वतंत्र भावना सारी प्रगतियों का कारण रही है। व्यक्ति को नष्ट कर देने की प्रवृत्ति रखने वाली कोई भी पद्धति अजनतांत्रिक है। विचार-विमर्श, समझा-बुझाकर सहमत करना, परस्पर समाधानकारी समझौता और दो तथा लो, ये जनतांत्रिक मार्ग की युक्तियां हैं।” इसलिए ऐसा कोई भी सिद्धांत, जो लचीला नहीं है तथा जो मानव के सम्मान और स्वातंत्र्य में विश्वास नहीं रखता, वह जनतांत्रिक व्यवस्था के उपयुक्त नहीं होगा। ऐसे दलों को या तो अपने सिद्धांतों को जनतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप बनाना चाहिए या जनतंत्र की केवल मौखिक सेवा बंद कर देनी चाहिए।

दल के कार्यकर्ताओं में अनुशासन का प्रश्न न केवल दल को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए अपितु सामान्य रूप से जनता के आचरण पर भी उसके प्रभाव की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। मुख्यतः सरकार सुरक्षा और संरक्षा का एक साधन है, न कि विनाश और परिवर्तन का। जनता में विधान के प्रति समादर की भावना उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि विधान का संरक्षक बनने की आकांक्षा रखने वाले दल इस दिशा में स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें । स्व-शासन की भावना और क्षमता जनतंत्र का सार है। यदि राजनीतिक दल स्वयं अपने को शासित नहीं कर सके तो वे समाज में स्व-शासन की इच्छा उत्पन्न करने की आशा कैसे कर सकते हैं? जहां एक ओर समाज के लिए व्यक्तिगत स्वातंत्र्य की प्रतिभूति (गारंटी) और रक्षा आवश्यक है, वहीं व्यक्ति के लिए भी सर्वसामान्य की इच्छा का स्वेच्छया आदर करना वांछनीय है। यह सहिष्णु भावना जितनी अधिक होगी, राज्य के अदम्य अधिकार उतने ही कम हो जाएंगे। कोई भी दल, जिसके कार्यों का किसी सरकारी विधान द्वारा नियमन नहीं होता अपनी इकाइयों द्वारा स्वेच्छया स्वीकृत निर्णयों के अनुसार चलते हैं। इसके उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं कि सर्वोत्तम व्यक्तिगत स्वातंत्र्य और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने सदस्यों के लिए एक आचरण संहिता निर्धारित करें और उसका कड़ाई से पालन करें।

जनतंत्र में एक से अधिक दलों का होना स्वाभाविक है। ये दल यदि स्वस्थ परंपराओं का विकास करना चाहते हैं, तो उन्हें किसी-न-किसी प्रकार के पंचशील का अनुसरण करना चाहिए। सैद्धांतिक आधार पर किसी दल से संबंध-विच्छेद को उचित माना जा सकता है, परंतु अन्य आधारों पर दलों द्वारा दल-बदल को प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में जब कोई दल बहुमत में न आए, या उसे अत्यल्प बहुमत प्राप्त हो, तब अन्य दलों से समर्थन पाने के लिए राजनीतिज्ञों द्वारा अनुचित साधन अपनाए जाने की संभावना है। यह आवश्यक है कि हम ग्रेट ब्रिटेन की द्विदलीय संसदीय पद्धति से कुछ अलग परंपराएं विकसित करें और अपनाएं। केवल उससे ही देश में स्थिर सरकार रहेगी और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का अखाड़ा बनने से दलों की रक्षा हो सकेगी।

ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिन पर विचार आवश्यक है। क्या जनतंत्र में विश्वास रखने वाले दल अपने उत्तरदायित्व को अनुभव करेंगे? सत्ता प्राप्त करने की उत्सुकता और शीघ्रता में उन्हें उस आधार को ही नष्ट नहीं कर देना चाहिए, जिस पर वे खड़े हैं।

-ऑर्गनाइज़र, फरवरी 27, 1961 (अंग्रेज़ी से अनूदित)