डॉ. मुखर्जी पृथकतावादी विचारों के विरोधी थे


दीनदयाल उपाध्याय

ह 23 जून का दिन था, जब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख़ अब्दुल्ला के कारागार में एक ‘शहीद की मृत्यु’ को अंगीकार किया। शेख़ अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य का अप्रतिबाधित ‘प्रधानमंत्री’ था। बाद में उसे न केवल पद से हटा दिया गया, वरन् पांच वर्ष के लिए जेल भी भेजा गया। छूटते ही उसने फिर अपनी कार्रवाई शुरू की। आज वह पुनः जेल के सींखचों के भीतर है और उस पर राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने का आरोप है। परंतु जिन कारणों से डॉ. मुखर्जी ने शेख़ की जेल में जाना स्वीकार किया और परिणामतः मृत्यु का आलिंगन किया, वह आज भी अधूरा है, अपूर्ण है।

डॉ. मुखर्जी का लक्ष्य

डॉ. मुखर्जी ने देश की एकता के लिए अपना जीवनदान कर डाला। भारतीय संविधान द्वारा जम्मू-कश्मीर की जनता के लिए स्वीकृत और संरक्षित मूलभूत अधिकारों के प्रति किसी भी प्रकार का भेदभाव उन्हें असह्य था। अब्दुल्ला और उसके सहयोगियों की निरंकुश वृत्ति को उन्होंने कभी भी स्वीकार नहीं किया। राज्य सरकार द्वारा उत्पीड़ित जम्मू की जनता से भी वे असंतुष्ट थे और इस बात से कदापि सहमत नहीं थे कि वहां की शेष जनता मुसलमानों के अत्याचारों को इसलिए चुपचाप सहन करती जाए, ताकि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अंग बना रहे। उनकी दृष्टि में भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार का पक्ष लेना और जनता के हितों की उपेक्षा करना अनुचित था। जम्मू और कश्मीर संबंधी अनेक ऐसी महत्त्वपूर्ण चीजों का उल्लेख डॉ. मुखर्जी ने पंडित नेहरू को लिखे गए अपने पत्र में किया है।”

संबंधों में सुधार

यह सही है कि जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद् और जनसंघ द्वारा किए गए आंदोलनों तथा डॉ. मुखर्जी के बलिदान के कारण इस राज्य के क़ानूनों और भारत के साथ संबंधों में अनेक सुधार हुए हैं, परंतु मूलरूप से संविधान तथा जनता के प्रति होने वाले व्यवहारों में आज भी साधारण से ही परिवर्तन दिखेंगे। इस दृष्टि से बख्शी और अब्दुल्ला की सरकारों का रुख़ प्रायः समान है। जम्मू कश्मीर राज्य आज भी भारत का अविभाज्य अंग नहीं है। जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार नहीं है। वहां पर शासन प्रांतीय सरकार के द्वारा ही होता है। भारतीय संसद् की प्रभुसत्ता इस राज्य के लिए प्रभुसत्ता नहीं। इस राज्य के अंतर्गत हमारी संपत्ति और नौकरी के लिए अनेक सीमाएं हैं।

राज्य सरकार के कुप्रयास

राज्य सरकार इस बात को समझाने का प्रयास कर रही है कि जनता को इस प्रकार की भेदभाव की नीति जारी रखने में अनेक लाभ हैं। एक निहित स्वार्थ को यहां लगाया जा रहा है। इस प्रकार जहां इससे भारत और जम्मू-कश्मीर की जनता के मध्य एक मनोवैज्ञानिक खाई उत्पन्न की जा रही है, वहीं पर राज्य के आर्थिक विकास में भी बाधा उत्पन्न की जाती है। भारत सरकार जबकि बिना किसी पक्षपात के विदेशी पूंजी को भी भारत में आमंत्रित करती है और अनेक बार तो उसका पक्ष भी लेती है; जम्मू-कश्मीर राज्य में भारतीय उद्योगपतियों को अपना उद्योग स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जाती। कश्मीर की जनता केंद्रीय सरकार के अनुदानों के बल पर नहीं जीवित रह सकती। उसे तो उपयोगी नौकरी प्रदान करनी होगी और यह तभी संभव है, जबकि राज्य का औद्योगीकरण हो। परंतु वर्तमान राज्य सरकार केवल दर्शकों और पर्यटकों को आमंत्रित करती है। किसी पूंजी लगाने वाले को वहां प्रवेश नहीं मिल सकता।

सरकारी पक्षपात

सरकारी प्रशासन ने जम्मू के 50,000 परिवारों को राज्यविहीन घोषित कर उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया है। भारत सरकार इस प्रकार के प्रवासी भारतीयों की, जो आज लंका में हैं, क्या चिंता कर सकती है, जबकि वह अपने ही लोगों की उन्नति कर सकने में असमर्थ है। इस प्रकार के परिवारों के मूलभूत अधिकारों को अस्वीकार करते समय सांप्रदायिक आधार पर विचार किया जाता है। राज्य सरकार को भय है कि यदि जम्मू के सभी लोगों को मतदाता सूची में अंकित कर लिया गया तो ‘वर्ग विशेष’ का अनुपात उलट सकता है।

विधानसभा में प्रतिनिधियों की संख्या जनसंख्या के आधार पर निश्चित न करके संवैधानिक उपबंधों के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार कश्मीर का पलड़ा भारी पड़ता है। यह हमें अंग्रेजों की उस कूटनीति का स्मरण दिलाता है, जिसके द्वारा अंग्रेज़ अल्पसंख्यकों को अधिक अधिकार देते थे।

केवल भारत के अन्य नागरिकों को ही यहां मूलभूत अधिकारों से वंचित नहीं किया जाता वरन् राज्य के ही लोगों को संसद् में अपने प्रतिनिधि भेजने का अधिकार नहीं है। राज्य विधानसभा के चुनावों के आधार पर राष्ट्रपति ही यहां से प्रतिनिधियों का नामांकन करता है। इस प्रकार संसद् में ‘राज्य’ का प्रतिनिधित्व होता है, जनता का प्रतिनिधित्व कदापि नहीं। इसके परिणामस्वरूप चुनाव संघर्ष क्षेत्रीय और प्रांतीय आधार पर होता है। उसका कोई अखिल भारतीय स्वरूप नहीं है। यहां के राजनीतिक दल मुश्किल से अखिल भारतीय नीतियों से संबंध रखते हैं।

प्रजा परिषद् के अनुसार राज्य के लोगों को भारत विषयक विशेष जानकारी ही नहीं है। राज्य सरकार संविधान और शासन के अधिकारों के विषय में भी अत्यंत पक्षपाती है। यह केवल सत्तारूढ़ दल की स्वाभाविक कमज़ोरी नहीं, अपितु नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रति पक्षपात की द्योतक है। जनता में ऐसे भाव विकसित किए जाते हैं, जिससे कि वे अपने को भारतीय न अनुभव करें, भारत के साथ भावात्मक एकात्मता के विचार उनमें न उत्पन्न हों, इस कारण से ही राज्य का एक अलग ध्वज, सदर-ए-रियासत और पृथक् संविधान रखा जाता है।

डॉ. मुखर्जी द्वारा विरोध

डॉ. मुखर्जी इन सभी पृथकतावादी प्रयासों के घोर विरोधी थे। वे संविधान की 370वीं धारा को निकालने के पक्षपाती थे, जो कि अस्थायी रूप से संविधान में प्रविष्ट कराई गई थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि भारत सरकार कश्मीर के लिए विशेष प्रकार की छूट देती है तो इसी प्रकार की मांग अनेक ओर से की जाने लगेगी। उनके सुझाव आज सत्य सिद्ध हो रहे हैं। जिस प्रकार के संविधान और प्रांत का रूप आज जम्मू-कश्मीर का है, उसी प्रकार के संविधान और पृथक प्रांत की मांग के रूप में आज अकाली आंदोलन जोर पकड़ रहा है। छूत का यह रोग बढ़ता ही जा रहा है। सरकार ने अपने को अकाली आंदोलन की मांगों के विरुद्ध घोषित किया है। देश के सभी राष्ट्रवादी दल और जनता का भी यही मत है। परंतु कश्मीर के विधान का क्या होगा? इसे भी तो इसके साथ ही दूर करना चाहिए। | संपूर्ण राष्ट्र डॉ. मुखर्जी का जन्मदिवस मनाएगा। आइए, हम इस बात के लिए प्रतिज्ञा करें कि हम उस लक्ष्य को पूर्ण करके ही रहेंगे, जिसके लिए कि डॉ. मुखर्जी ने अपना जीवन होम कर दिया। उनकी मृत्यु संविधान की 370वीं धारा के कारण ही हुई। आज हम कह नहीं सकते कि उसके कारण और भी कितने लोग कष्ट उठाएंगे और उसी स्थिति को प्राप्त करेंगे।

जम्मू के मार्ग पर डॉ. मुखर्जी ने एक सभा में कहा था, ‘विधान दूंगा या जान दूंगा’। उनके विधान का अर्थ राज्य का एक संविधान नहीं था। वे भारतीय संविधान को कश्मीर की जनता को प्रदत्त करना चाहते थे। आज भी कश्मीर राज्य का एक संविधान है, पर भारतीय संविधान उनका संविधान नहीं। हमें उस क्षण तक विश्राम नहीं लेना है, जब तक कि जम्मू कश्मीर के हमारे भाई भी उस संविधान के अधिकारों और कर्तव्यों का सुख न प्राप्त कर सकें, जिसका कि हम लोग करते हैं। हमें वह स्थिति लानी है, जबकि कश्मीर की जनता संविधान के अनुसार हमारे कंधे से कंधा मिलाकर चल सके। ऐसी स्थिति में ही वे चीन और पाकिस्तान द्वारा किए गए भूमि अपहरण से उत्पन्न वेदना को अनुभव करेंगे। तभी वे अपना सर्वस्व त्यागकर इस अपहृत भू-भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर होंगे। संविधान से 370वीं धारा का निष्कासन देश और कश्मीर राज्य की जनता में जागरूकता तथा चेतनता उत्पन्न करने के लिए जादू जैसा कार्य करेगा। लद्दाख क्षेत्र पर चीनी क़ब्जे को ध्यान में रखते हुए जम्मू कश्मीर और भारत के बीच उत्पन्न की गई समस्त मानसिक संकुचितताओं को दूर करना आवश्यक है।

(पाञ्चजन्य, जुलाई 4, 1960)