ऐतिहासिक जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 : सामाजिक न्याय की ओर एक और कदम


डा. थावरचंद गेहलोत

ऐतिहासिक जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 सरदार पटेल के जन्म-दिन (राष्ट्रीय एकता दिवस) के अवसर पर 31 अक्तूबर से लागू होगा। वस्तुतः इस साहसिक कार्य को पूरा करके प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भारत के संस्थापक, सरदार पटेल और डॉ. अंबेडकर को भाव-भीनी श्रदांजलि दी है। ऐसा करने से, जम्मू और कश्मीर को मुख्य धारा में मिलाने की वर्षों पुरानी राष्ट्रवादी मांग को पूरा किया गया है और आज भारत कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक राष्ट्र है। स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी का यह सपना कि एक देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो झंडे नहीं हो सकते हैं, आज साकार हुआ है जिसे संसद के दोनो सदनों ने भारी बहुमत से पारित करके मूर्त रूप दिया है।

जब यह विधेयक लागू होगा, भारत का संविधान जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख की संघीय सीमाओं में पूर्णतः लागू हो जाएगा। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सभी अधिकार उन सभी लोगों को भी मिलेंगे जो अब तक भारतीय संविधान के उदारवादी उपबंधों से वंचित थे। अनुच्छेद 370 के कारण, पूर्ववर्ती जम्मू और कश्मीर राज्य की जनता के साथ सरासर अन्याय हो रहा था। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण स्वतः ही कार्यान्वित नहीं होता था और प्रत्येक बार इसे विशेष उपबंध के द्वारा राज्य पर लागू करना पड़ता था, जिससे विलंब होता था और विसंगतियां उत्पन्न होती थी। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का भी अभी तक कार्यान्वयन नही हो सका था। सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993, जिसके आधार पर हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन और शुष्क (फ्लश रहित) शौचालयों के निर्माण करने पर दण्ड मिलता है, वह इस राज्य पर लागू नहीं होता था, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधिनियम, 1993, अनुच्छेद 370 के कारण लागू नहीं होता था, हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों से नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होता था जिसके कारण जम्मू और कश्मीर में समाज का एक वर्ग इस कानूनी संरक्षण से वंचित था।

इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को भी कार्यान्वित नहीं किया गया था, जिसकी वजह से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को भेदभाव, दुरुपयोग और हिंसा से कोई संरक्षण नहीं मिला था। जम्मू व कश्मीर राज्य में ही एक जाति अर्थात वाल्मिकि समुदाय के सदस्यों को किसी भी सरकारी नौकरी को प्राप्त करने की कानूनन अनुमति नहीं दी गई थी, चाहे यह सफाई कामगार की भी क्यों न हो। इससे कोई असर नहीं पड़ता चाहे किसी व्यक्ति के पास पी.एचडी. की डिग्री हो, लेकिन उसे भी सरकारी नौकरी लेने से वर्जित किया गया। ऐसी स्थिति की कल्पना किसी और राज्य में नहीं की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, उन्हें राज्य में मतदान के अधिकार और संपत्ति के पूर्ण अधिकार से वंचित रखा गया था जो उनके सामाजिक-आर्थिक विकास में एक बाधा बनी। वे शहरों में न तो कोई जमीन खरीद सकते थे और न ही वहां बस सकते थे जबकि अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या को इसकी अनुमति दी गई थी। बटवारे के बाद आए हिन्दू और सिक्ख शरणार्थियों को मतदान और आवास के अधिकार से वंचित रखा गया था और उन्हें अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहने के लिए बाध्य किया गया था। अनुच्छेद 370 के ये लाभ थे जिनका कुछ विपक्ष दल समर्थन कर रहे हैं।

अन्याय की यह गाथा यहां पर समाप्त नहीं होती है। उच्चतम न्यायालय द्वारा समलैंगिकता को अपराध न मानने के बारे में दिया गया निर्णय जम्मू व कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होता है। इसका अर्थ यह है कि भारत के एलजीबीटीक्यू नागरिकों को अभी भी जेलों में भेजा जा सकता है और वे उत्पीड़न के शिकार हो सकते हैं। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिए अधिक कारगर प्रावधान करने के लिए बनाया गया माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 उस राज्य में लागू नहीं किया गया था। अनुच्छेद 370 की वजह से राज्य के लोग दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 से अभी तक वंचित थे। इसके अलावा, राज्य में 200 वर्षों से अधिक समय से रह रहे लाखों गोरखों को स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं दिए गए थे। लेकिन अब उन्हें नागरिक के रूप में माना जाएगा और भारतीय संविधान के तहत उनको पूर्ण अधिकार दिए जाएंगे और वे अपनी इच्छा अनुसार नौकरियों के लिए और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में सीटों के लिए आवेदन कर सकेंगे।

इसके अलावा, अनुच्छेद 35-ए जिसकी मौजूदगी से जम्मू और कश्मीर राज्य को ”विशेष दर्जा” मिला और इससे महिलाओं को उनके राज्य के बाहर विवाह करने पर संपत्ति के अधिकारों से वंचित रखा गया, यह उनके प्रति अन्याय था जो मंजूर नहीं था।  यहां तक कि 2002 में आंशिक न्यायिक राहत मिलने के बाद भी, उनके बच्चों को अभी तक उत्तराधिकारी होने के अधिकारों से वंचित रखा गया था।  पुरुषों के लिए कोई ऐसा प्रावधान नहीं था।  यह संस्थागत रूप से महिलाओं से भेदभाव था।  इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 370 की मौजूदगी से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 भी लागू नहीं हो पाया था।

परन्तु अब इन अन्यायों को समाप्त कर दिया गया है और जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख के पूर्ण संवैधानिक एकीकरण के साथ पक्षपात करने वाले कानूनों और प्रावधानों को रद्द कर दिया गया है।  यह कार्य गणतंत्र के इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण आजादी दिलाने वाले कार्यों में से एक है जब दलित, आदिवासी, महिला, जातीय रूप से अल्पसंख्यकों, एलजीबीटीक्यू, धार्मिक रूप से अल्पसंख्यकों को भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत संपूर्ण अधिकार और रक्षोपाय प्रदान किए गए हैं, यह संविधान विश्व में अत्यधिक सुधारवादी, उदारवादी संविधानों में से एक है जो कि सामाजिक न्याय और समतावादी के आदर्शों पर आधारित है। इस ऐतिहासिक कदम से अब जम्‍मू कश्‍मीर, करगील और लेह-लद्दाख  के लाखों वंचित, दलित, आदिवासी, महिलाओं और युवा देश की मुख्‍य धारा से कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे I साथ ही देश की एकता अखंडता, सामाजिक समता ओर समरसता को अत्‍यधिक बल मिलेगा I

5 अगस्त को संसद में क्या हुआ था, उस दिन संविधान की भावना को फिर से रोशन किया गया और संसद के अंदर और बाहर विधेयक को सभी ने सोच-समझकर समर्थन किया।  भारत की जनता ने मुक्त कंठ से इसका भरपूर स्वागत किया।  इतिहास इस दिन को याद रखेगा और आने वाली कई सदियां प्रधानमंत्री मोदी के इस कार्य का सम्मान करेगी।

(लेखक केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री है)