यह मेरा नहीं सबका है और इसलिए राष्ट्र का है


दीनदयाल उपाध्याय

र्म का मुख्य तत्त्व है उसका आचार। धर्म और अधर्म का विचार करने पर महाभारत का एक वाक्य स्मरण हो आता है, जिसमें कहा गया है- “कभी दूसरे से ऐसा व्यवहार न करो, जो यदि तुम्हारे साथ किया जाए तो तुम्हें कष्टदायक लगे।” वस्तुतः समष्टि धर्म का आधार आत्मीयता ही है। संपूर्ण समाज के प्रति यह अपनेपन का भाव मन में लेकर ‘अहं भाव’ हटाकर आत्मीयता का भाव जगाना ही सच्चा धर्म है।

हम यज्ञ करते हैं। यज्ञ करते समय कहते हैं ‘इदं न मम्’ यह मेरा नहीं है। यज्ञ के उपरांत जो शेष रहता है, उसे हम भगवान् के प्रसाद-स्वरूप ग्रहण करते हैं। ऐसा नहीं कि यज्ञ बाद में हो और प्रसाद पहले बंट गया। हमारे यहां तो कहा गया है कि जितना हम पैदा करते हैं-वह सब मेरा नहीं। एक व्यक्ति, वेतन पाता है तो वह सारे वेतन का उपयोग स्वयं के लिए नहीं करता। वह रुपए लाकर पिताजी या माताजी को दे देता है और उस धन का उपयोग संपूर्ण परिवार की आवश्यकताओं के लिए किया जाता है। हम जब भोजन करते हैं, तो कहते हैं ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्दं तुभ्यमेव समर्पयेत्’ भोजन भी हम स्वयं के लिए नहीं करते तो इसलिए करते हैं कि यह जो ईश्वर की अपार कृपा के कारण हमको मानव शरीर मिला है, इसका संरक्षण हो सके, ताकि धर्म संरक्षण के ईश्वरीय कार्य के लिए इस शरीर का समुचित उपयोग हो सके। मैं केवल अपना ही नहीं, दूसरों का भी विचार करूंगा। इतना विचार मात्र हमारे अंदर आ जाए तो हम कहेंगे कि हम धर्म के आधार पर खड़े हैं।

धर्मराज युधिष्ठिर के बारे में कहा गया है कि उन्होंने अपना ही नहीं, दूसरों का भी विचार किया। एक बार पांचों पांडव कुंती के साथ जंगल में जा रहे थे। जाते-जाते कुंती को प्यास लगी। पानी लाने के लिए भीम एक तालाब के पास गए। वहां उन्हें यक्ष ने रोका और कुछ पूछा। उचित उत्तर न पाने पर वह क्रोधित हो गया और भीम को बेहोश कर डाला।

काफ़ी देर के बाद भी भीम के न लौटने पर अर्जुन उनकी सुधि लेने गए और अर्जुन का भी वही हाल हुआ। फिर क्रमशः सहदेव और नकुल गए पर उनका भी वही हाल हुआ। अंततोगत्वा युधिष्ठिर स्वयं गए। यक्ष ने युधिष्ठिर से भी वही प्रश्न पूछा। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, यक्ष प्रसन्न हो गया और कहा, “जाओ, पानी ले लो तथा किसी एक भाई के पुनर्जीवन का वरदान मांग लो।” युधिष्ठिर ने कहा, “यदि तम स्वयं ऐसा कहते हो तो नकुल अथवा सहदेव में से किसी एक को जीवित कर दो।” यक्ष को आश्चर्य हुआ।

उसने कहा, “अर्जुन और भीम से भाइयों को छोड़कर तुम इनको जिंदा करने के लिए कहते हो, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। अर्जुन गांडीवधारी है। भीम अभूतपूर्व बलशाली पुरुष है। तुम उनको क्यों नहीं मांगते?” युधिष्ठिर ने सहज उत्तर दिया- “हमारी दो माताएं हैं, कुंती और माद्री। सौभाग्य से कुंती का एक पुत्र मैं जीवित हूं। माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहे, इसलिए तुम नकुल अथवा सहदेव में से किसी को भी जीवित कर दो।” उन्होंने वहां पर यह विचार नहीं किया कि अर्जुन धनुर्धारी है, भीम अतीव बलशाली योद्धा है। विचार किया तो धर्म का किया और कहते हैं कि इस उत्तर से यक्ष इतना प्रसन्न हो गया कि उसने चारों भाइयों को जीवित कर दिया। हम तो इस प्रकार से धर्म का विचार चाहते हैं।

दो अक्षरों से मृत्यु, तीन में अमरता ‘मम इति मृत्युः, ममत्व ही मृत्यु है। न मम’ ही अमरता है। यह मेरा नहीं, सबका है और इसीलिए राष्ट्र का है। इस प्रकार का भाव ही सच्चा राष्ट्रभाव है। इसी में से त्याग की वृत्ति पैदा होती है। इसी वृत्ति से जीवन की सारी समस्याओं का हल निकल आता है।

कई बार विवाद खड़ा हो जाता है कि राजनीति बड़ी है या अर्थनीति? इस विवाद पर विचार करते समय उपनिषद् की एक कथा याद आती है। कहते हैं कि एक बार शरीर के सब अंगों में परस्पर झगड़ा हो गया कि सबमें बड़ा कौन है? हर एक अंग अपने को बड़ा कहने लगा, आंख ने कहा-मैं बड़ी, नाक ने कहा -मैं, मुंह ने कहा- मैं और पांव ने कहा-मैं सबसे बड़ा हूं। हाथ भी पीछे क्यों रहते? हाथों ने कहा-मैं वास्तव में बड़ा हूं। सभी अंग इस विवाद को लेकर प्रजापति के पास गए और कहा, आप निर्णय दें कि हम सबमें बड़ा कौन है? प्रजापति ने सोचा, क्या बला आ गई है! आख़िर उन्होंने बड़ी चतुराई से काम लिया। उन्होंने कहा- जिसके न रहने से बाकी सब बेकार हो जाएं, वह बडा। सभी अंग प्रसन्न थे। हर एक को लगता था कि मेरे न रहने से सब बेकार! सब अहंकार से भर गए। आख़िर निर्णय को कार्यान्वित करने के लिए तय हुआ कि एक-एक करके देखा जाए, किसके बिना काम नहीं चल सकता ? सबसे पहले आंख पृथक् हुई। एक वर्ष बाद उसने पुनः आकर देखा तो सारे काम ठीक चल रहे हैं। मेरे न होने के कारण कोई कष्ट न हुआ। मैंने सोचा था कि मेरे न होने पर काम नहीं चलेगा, पर यहां तो लाठी के सहारे काम चल रहा है। फिर कान महादेय पृथक् हुए, पर काम चलता रहा। इसी तरह पैर गए, हाथ गए, पर काम चलता रहा। मन पृथक हुआ तो शरीर को और सुख हुआ। बाक़ी अंगों ने कहा-महाराज! आप चले गए, बड़ा अच्छा रहा। लौटकर मत आइए। मन ने पूछा-क्यों? तो ज़बान बोली-तुम्हारे कारण कितनी तक़लीफ़ होती थी। यह मिठाई खाओ, वह चाट खाओ आदि सबसे मुक्ति मिल गई। आंख ने भी हां में हां मिलाई।

अब प्राणों की बारी आई। प्राण महोदय ने ज्यों ही बिस्तर बांधकर जाने की तैयारी की कि हलचल मच गई। आंख, कान, नाक, हाथ, पैर सब घबराए। उनकी अकल में आ गया कि भाई, यदि प्राण महोदय चले गए तो हम सब बेकार हो जाएंगे। सब मिलकर गए, बोले-महाराज! आप मत जाइए। आप जाएंगे तो हम सब समाप्त हो जाएंगे। आप सबसे बड़े हैं।

यही हाल राष्ट्र का है। राष्ट्र सुरक्षित है तो सब ठीक है। राष्ट्र के जितने अंग हैं, सब काम करेंगे। राष्ट्र है तो धर्म भी रह सकेगा; धन-धान्य भी रह सकेगा। हमारा मंत्री, राजा, हमारा अभियंता, हमारा कृषक सब काम करेंगे। इसलिए प्राण की भांति राष्ट्र सुरक्षित एवं सामर्थ्यवान रहे। यह हमारी पहली आवश्यकता होनी चाहिए।

एकमेव मार्ग

हम विचार करें, आख़िर यह जो खाद्य समस्या हमारे सामने है, उसका हल क्या है? अन्न उपजाने का काम तो किसान ही करेगा। व्यापारी का काम व्यापारी करेंगे। प्रधानमंत्री का काम प्रधानमंत्री करेंगे और सेना का सेना। ऐसा अपेक्षित नहीं कि सेना को छुट्टी दे दी जाए और देश की रक्षा करने के लिए नागरिक मार्चिंग करते हुए लद्दाख में चीनियों से लड़ें। यहां तो सेना को ही लड़ना होगा, किंतु देश में एक समष्टिगत भाव, सामाजिकता, जीवन में सहकारी भाव उत्पन्न करना होगा। यही प्रमुख कार्य है। एक बार यदि यह हो तो बाक़ी के जितने अनेक अंग हैं, सब ठीक काम कर सकेंगे और यह भाव नष्ट हो गया तो न सेना देश के लिए लड़ेगी, न किसान देशवासियों की क्षुधा मिटाने के लिए परिश्रम करेगा। अतः राष्ट्र के चिरजीवन के लिए समष्टि भाव का जागरण आवश्यक है। आज राष्ट्रात्मा कमजोर हो गई है। एकात्मता के बंधन ढीले पड़ गए हैं।

आत्मीयता का स्थान घृणा ने ले लिया है। इसी राष्ट्रभाव के ह्रास से अनेक समस्याओं को जन्म मिला है। इन समस्याओं का ऊपरी निदान समस्या का स्थायी हल नहीं प्रदान कर सकता। यह एक त्रिकालाबाधित सत्य है कि राष्ट्र भाव को छोड़कर कोई भी राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता, न अतीत में कर सका, न भविष्य में कर सकेगा। अतः राष्ट्रोद्धार का विचार करने वाले देशभक्त को इस मूल समस्या पर विचार करना चाहिए। जब तक धर्म और संस्कृति के बारे में पूर्वाग्रह छोड़कर उसके व्यापक और सनातन तत्त्व का साक्षात्कार कर राष्ट्र जीवन को सुदृढ़ बनाने का प्रयास नहीं होता, तब तक हमारी सर्वांगीण उन्नति का पथ अवरुद्ध ही रहेगा।
                                                         -पाञ्चजन्य, दिसंबर 5, 1960