महागठबंधन : एक ढकोसला



गोपाल कृष्ण अग्रवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नफरत के कारण एकजुटता दिखा रहे और अपने राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे विभिन्न विपक्षी दल, बिना किसी साझा नीति या विचारधारा के, खुद को ‘महागठबंधन’ का नाम देकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के खिलाफ एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस अपने को इस महागठबंधन का केंद्र बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दूसरे राजनैतिक दल उसके नेतृत्व को कतई स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। राज्य स्तर पर महत्व रखने वाली कई राजनीतिक पार्टियां भी महागठबंधन में शामिल नहीं हुई हैं। इससे साफ है कि एनडीए के खिलाफ संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा करना सम्भव नहीं हो पा रहा है ।

अगर हम देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से शुरू करें; तो वहां पर समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने के लिए गठबंधन किया है लेकिन इसमें कांग्रेस शामिल नहीं है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं हो पाया है और कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के बीच वाकयुद्ध शुरु हो गया है। दिल्ली में ऐसा माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी (आप) कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगी, इसलिए उनके बीच भी किसी प्रकार के गठबंधन की संभावना कम ही है। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के खिलाफ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट खड़ा है और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से लेफ्ट और कांग्रेस के बीच लड़ाई और भी तेज़ हो गई है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी कमोवेश यही हाल है। कांग्रेस असम में बदरुद्दीन अज़मल के संगठन के साथ भी गठबंधन करने में विफल रही है। इन सभी राज्यों में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबला होगा, जिसने महागठबंधन को अप्रासंगिक बना दिया है। इन 8 राज्यों में लोकसभा की कुल 226 सीटें हैं।

हालांकि, कांग्रेस खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी कहती है, लेकिन बिहार में महागठबंधन की प्रमुख सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) है और कांग्रेस को 40 में से सिर्फ नौ सीटें दी गई हैं, जबकि बाकी सीटें उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और मुकेश साहनी जैसे नेताओं के छोटे दलों को दे दी गईं। तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को केवल नौ सीटें मिली हैं, जबकि पुडुचेरी एकमात्र सीट उसे लड़ने के लिए दी गई है। नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) और कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर की तीन लोकसभा सीटों के लिए गठबंधन किया है और तीन अन्य सीटों पर दोस्ताना चुनाव लड़ने की बात की हैं। कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) ने 8 सीटें पाने के लिए काफी मोलभाव किया है और कांग्रेस वहां पर 20 सीटों पर अपना भाग्य आजमाएगी, जबकि राज्य में पहले से ही जेडी(एस) का मुख्यमंत्री है।

झारखंड में कुल 14 लोकसभा सीटें हैं। कांग्रेस को सात सीटें, झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को चार, झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) को दो और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी को एक सीट दी गई थी। लेकिन यहां भी महागठबंधन में दरारें आ चुकी हैं। आरजेडी ने सीटों के इस बंटवारे पर आपत्ति जताई और चतरा से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया, जबकि यह सीट कांग्रेस के हिस्से में आई थी। झारखंड में सीट बंटवारे के समझौते के अगले दिन ही आरजेडी की प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी भाजपा में शामिल हो गईं जो गठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है। महाराष्ट्र में कांग्रेस 26 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) अपने लिए 22 सीटें हासिल करने में कामयाब रही है। एनसीपी के साथ सीटों के बंटबारे को लेकर कांग्रेस में आंतरिक कलह चल रही है और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चव्हाण भी इससे नाराज़ हैं।

एक ओर जहां इस तथाकथित महागठबंधन को लेकर पूरी तरह से अनिश्चितताएं हैं, वहीं एनडीए में पहले से ही 39 राजनीतिक दलों गंठबधन है। एनडीए की एकता तभी नज़र आ गई थी जब उन्होंने बिहार की लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा को साथ में किया था। गुजरात की गांधीनगर सीट से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नामांकन के समय भी एनडीए ने अपनी पूरी ताकत का प्रदर्शन किया गया था। भाजपा पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। ये दोनों ही भाजपा के दशकों पुराने सहयोगी हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता का विश्लेषण यह बताता है कि चुनाव पूर्व परिदृश्य में महागठबंधन विखंडित है और नेतृत्वहीन नजर आ रहा है। एनडीए की तुलना में अखिल भारतीय स्तर पर महागठबंधन की मौजूदगी भी वैसी नहीं है। एनडीए के सभी सहयोगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे है। महागठबंधन में शामिल दल कई राज्यों में अलग-अलग चुनाव लड़ सकते हैं। यह सीटों के बंटवारे को लेकर किसी भी तरह का समझौता न कर पाने में विफलता के अलावा और कुछ नहीं है।

महागठबंधन का यह शोर-शराबा केवल एक ढोंग है और मोदीजी के विरोध का ये हौआ इस लोकसभा चुनाव के आगे बढ़ने वाला नहीं है।

(लेखक भाजपा के आर्थिक मामलों के प्रवक्ता हैं)