मोदी 2.0 : सत्ता की परिभाषा बदलनेवाला जनादेश


डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे

त्रहवीं लोकसभा की मतगणना 23 मई को संपन्न हुई। दोपहर तक आए परिणामों द्वारा नरेन्द्र मोदी सरकार की पुनर्स्थापना होगी, यह स्पष्ट हो गया था। प्रधानमंत्री कौन होंगे? इस अहम मुद्दे के उपरान्त भी कई और बिंदु इस लोकसभा चुनाव में निर्णायक साबित हुए। प्रश्न नेतृत्व का भी था। वैश्विक राजनितीक पटल पर भारत द्वारा निर्गमित निरंतर तथा वैशिष्टयपूर्ण भूमिका का था। भ्रष्ट्राचार निर्मूलन के लिए आवश्यक गढ़ी हुई राजनैतिक इच्छाशक्ति टिके रहेना का था। अपितु मतपेटी की पुरानी विघातक राजनीति की ओर फिर से मुड़ने का, या विकास के राजपथ पर निरंतरता और दृढ़ता से चलने का भी था। उपरान्त सारे प्रश्नों पर मतदाताओं द्वारा लिया गया निर्णय 23 मई की संध्या तक स्पष्ट हो गया था। केवल सत्ता परिवर्तन न होकर परिवर्तन के प्रति विश्वास अर्जित किए गए लोग ही सत्ता में वापस आएंगे यह स्पष्ट था।

लंबे समय के बाद वर्तमान सरकार की पुन:स्थापना के लिए व्यापक जनादेश प्राप्त किया जा सकता है, इस चुनाव से यह बात सिद्ध हुई। भारतीय राजनीति में ‘एन्टी इन्कम्बसी’ के मुद्दे का प्रचलन कई बार अनुभव किया गया है। इस चुनाव में ‘मोदी ही चाहिए’ इस उत्कटता भरी जनभावना, उमंग और ताकत को जनादेश में परावर्तित होने का अनुभव हुआ। इस प्रकार के जनादेश का अनुभव पंडित नेहरु, इंदिरा गांधी, वाजपेयी तथा डॉ. मनमोहन सरकार ने भी किया था। नेहरु युग में मतदाता सन्मुख कोई विकल्प न था। 1971 की युद्ध विजय की सरकारानुकूल जनभावना को इंदिराजी ने माहिरता से मध्यवर्ती चुनावों द्वारा उपयोग में लाया था। अटल सरकार ने 1999 में जनादेश की प्राप्ति का पुन: अनुभव किया था, किंतु उनके ऊपर पूर्व में किए गए कामकाजों का बोज न था। 2009 में मनमोहन सरकार को पुनर्जनादेश मिला था। अपितु वह 2019 की मोदी सरकार जितना नि:संदेह और मजबूत न था।

‘नरेन्द्र मोदी सरकार की रिपोर्ट कार्ड’ यह प्रमुख चुनावी बने मुद्दे ने भारतीय राजनीति का व्याकरण ही बदल दिया है। इस चुनाव में अनुभव की हुई जनचर्चा में (पब्लिक डिसकोर्स) राजनीति की दिशा बदलने का सामर्थ्य भी दिखाई दिया है। जाति-धर्म, संप्रदाय भांति विदिर्ण अस्मिता के मुद्दे से उठकर विकास का मुद्दा दृष्टिगोचर हो रहा था। अस्मिता के मुद्दे को सीमापार करना इतना सरल नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इन मुद्दों का अपना प्रभाव होता है। फिर भी इन सारे मुद्दों से ऊपर उठकर ‘देशभक्ति और विकास’ इन दो विचार क्षेत्रों के अद्भुत रसायन ने चुनाव का माहौल भावभूत हुआ था।

‘देशभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मुद्दों की व्यापक चर्चा भी हुई। विकास के मुद्दे के इर्द-गिर्द बहस भी हुई। लेकिन जिन ‘आकांक्षी वर्गों’ ने ‘विकास’ का अनुभव किया था, उनकी चेतना इस चुनाव में अदृश्य लहर साबित हुई। उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय निर्माण अनुदान, घर-घर बिजली पहुंचाने वाली सौभाग्य योजना आदि योजनाओं के व्यापक और असरदार अमल से सामान्य जनों के हृदय में मोदी सरकार की जगह बन गई थी। इस वास्तविकता को कोई बदल भी नहीं सकता था।

देश के सर्वोच्च नेतृत्व की अनित्य परिश्रमशीलता, प्रशासनिक कार्यों का तुरन्त निपटारा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनोखी कार्यसिद्धि इससे भी परे मोदीजी का प्रामाणिक संकल्प इन सारे बिंदुओं से मोदीजी के नेतृत्व पर जनता का विश्वास अविचलित हो गया था। राफेल के अपप्रचार के बावजूद भी जनता का प्रधानमंत्री मोदीजी की प्रामाणिकता पर भरोसा अटल, अनिश्चल रहा। यह भी इस चुनाव की विशेषता थी।

उपलब्ध कार्यों की विरासत समेटकर नरेन्द्र मोदी फिर एक बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसनस्थ हुए है। नई पारी में उनके सन्मुख डटी हुई चुनौतिओं का सामना इतना आसान भी नहीं है। विकास का मुद्दा सरकार की झोली में डालकर जनता चैन से बैठ नहीं सकती। जनता की सम्मुच्च भागीदारी के बिना विकास संभव नहीं, इसका स्पष्ट आकलन स्वयं प्रधानमंत्रीजी के पास है। जनता की तेजी से उभरी हुई आकांक्षाओं की सीढ़ी सरकार को बड़ी कल्पकता से पकड़कर रखनी होगी। आयुष्यमान भारत योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आदि महत्तम योजनाओं को आवश्यक सुधार के साथ प्रभावी रूप से क्रियान्वित करना, यह चुनौती का विषय है। किसानों की उपज को समर्थन मूल्य से ज्यादा मुआवजा मिलना और साथ-साथ मध्यमवर्ग को महंगाई की आंच न लगना, नागरी जीवन की आवश्यकताओं में गुणवत्ता से सुधार लाना और उसे समय पाबंद पूरा करना, घुसपैठी और आतंकवाद को काबू में रखने के पूर्वानुभव को अनित्य रखना इस प्रकार की अनेक चुनौतियां सरकार सन्मुख है। हर्ष की बात यह है कि नेतृत्व इन सारी बातों से भली-भांति परिचित है।

एक तरफ अमेरिका का दबाव और दूसरी तरफ इरान के साथ रहे हमारे सामरिक महत्वपूर्ण संबधों को दृढ़ बनाने की आवश्यकता, इन दोनों परिस्थितियों से समाधान निकालते हुए सरकार ने अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों की चुनौती को स्वीकार तो कर लिया, अपितु यह एक स्थायी चुनौती ही रहेगी। इसके अतिरिक्त वैश्विक अर्थव्यवस्था के अन्य उतार-चढ़ावों का सामना करते हुए सकल घरेलू उत्पाद का विकास दर चढ़ते क्रम में रखना यह भी एक चुनौती ही है।

प्रजातंत्र में ‘मीडिया’ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इस मीडिया विश्व नें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार स्थापित होने का स्वागत किया है, फिर भी उसमें विशाल हृदयता तथा खुले मन की कमी दिखाई देती है। मीडिया जगत की भूमिका अधिक पक्षपातरहित कैसे हो सकती है? इसका समाधान ढूंढने की चुनौती भी नए सरकार के सामने है।

प्रधानमंत्री ने संसद के केंद्रीय सभागृह में किए हुए भाषण में अल्पसंख्यक समूहों का विश्वास प्राप्त करने पर भी काफी जोर दिया था। विश्वास प्राप्त करने का यह कार्य जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही वह जटिल और कठिन भी है। कट्टरतावाद की मोहिनी उच्च विद्या विभूषित व्यक्ति को भी सहजता से अपने वश में कर लेती है और उसमें से आतंकवाद फैलता है यह सत्य विश्वभर में हुई अनेक घटनाओं से सामने आया है। इसलिए शिक्षा का व्यापक प्रसार, विकास के अवसरों की पर्याप्त उपलब्धता, युवाओं का प्रबोधन आदि रुढ़ समाधानों से आतंकवादी प्रवृत्तियों को नष्ट करना आसान नहीं रहा। उसके लिए अधिक कल्पकता और प्रभाव से भरी उपाय-योजनाएं करनी होगी। यह सब करते हुए विकास के पथ पर बना हुआ विश्वास और अधिक व्यापक करना होगा। विकास ही केवल हमारा मुक्तिदाता है यह चेतना दूर तक फैलानी होगी।

जातिवाद, भ्रष्टाचार, स्वच्छ भारत अथवा कानून का सम्मान, परिवेश की रक्षा आदि कुछ विषय ऐसे है, जिसमे सरकार के साथ-साथ जनता ने स्वयं के आचरण और विचारों के स्तर पर इन मुद्दों के उपर कार्य नहीं किया, तो इन चुनौतियों का सामना करना कठीन है। यही कारण रहा है कि मोदीजी ने जनसहभागिता के सिद्धांत को निग्रह से अग्रेषित किया है। अपितु यह प्रत्यक्ष रूप में लाना निश्चित ही आसान नहीं है। गैस ग्राहक और रेल यात्रियों को सब्सिडी छोड़ने की अपील सफलता से किए हुए प्रधानमंत्री भलिभांति यह जानते है कि जनता के व्यवहार में बदल लाए बिना उनकी रग-रग में बसी हुई आदते बदलेंगी नहीं। ऊंचे स्वर में ‘भारत माता की जय’ की घोषणा देनेवाले युवकों को अपनी ही पवित्र भूमि पर थूंकना, कचरा फेंकना ऐसा गैर-जिम्मेवारी भरा बर्ताव शोभा नहीं देता, ऐसे खड़े बोल उन्होंने सुनाए थे, इस बात को भी ध्यान में रखना होगा।

व्यापक जनसमर्थन पाकर प्रधानमंत्री मोदी एक बार फिर से सत्ता विराजमान हुए है। सदन नेता की औपचारिकता संपन्न होने पश्चात अहमदाबाद में कार्यकर्ताओं के समीप किए गए भाषण में प्रधानमंत्रीजी ने देश को गरिमामय इतिहास लौटाने का संकल्प किया है। यह गरिमामय इतिहास संपन्नता, समाधान और विराट भारत का पुनर्स्मरण है। सोने की चिड़ियां, दूध-दही की नदियां, सुजलाम-सुफलाम भारत का उद्घोष भारत वर्ष को प्राचीन गरिमामय संपन्न इतिहास याद दिलाता है। यह प्राचीन वैभव केवल भौतिकता में सीमित न था। ‘ओल्ड इज गोल्ड’ या ‘इतिहास पन्ने में ही रहे’ इन दो विभिन्न भूमिकाओं को त्यागकर हम संतुलित मध्य का चिंतन स्वीकार सकते है। नित्य नूतन, चिरपुरातन, भारतीय संस्कृति की मूलाधार चिंतन से समय विपरीत समय विसंगत विषयों को त्यागने का विचार ही हमे उन्नयन की ओर ले जाता है। नरेन्द्र मोदी अपनी नीति और कार्यक्रम से हमेशा शाश्वत दर्शन का अनुभव कराने मे सफल रहे हैं।

“महिलाओं को पीड़ा देने वाला व्यक्ति किसी न किसी महिला का बेटा, भाई या पति होता है। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों ने युवा सदस्यों को देर रात तक बाहर क्या कर रहे हो? इस प्रकार के सवाल पूछने का साहस दिखाना होगा। लड़कियों की गतिविधियों पर पाबंदी लानेवाले दक्ष अभिभावकों ने बेटों को भी सवाल पूछने चाहिए।” यह किसी भाषण में चिंतित हुए मोदीजी के विचार परंपराधिष्ठीत परिवार व्यवस्था अंतर्गत की महिला-पुरुष समानता का सूत्र अधोरेखित करता है।

“नौकरी मांगनेवाले न बनकर, नौकरी देनेवाले बनो” यह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का सुत्र विगत अनेक दशकों से क्रियान्वयन की प्रतिक्षा में था। इस सूत्र अनुरूप ‘मुद्रा योजना’ जैसा उपक्रम मोदीजी के कार्यकाल मे ही अनुभव किया गया पिछड़े वर्गों की उन्नति का मार्ग आर्थिक स्वावलंबन तथा प्रगति से ही होता है। यह समझकर-जानकर मोदी सरकार के कार्य सामाजिक न्याय की संकल्पना को व्यवहार में लाने के लिए परिणामकारक साबित हुए है।

शीर्षस्थ स्थान की शासन प्रणाली और राजनीति में कुंठित हुई उद्देश्यहीनता को समाप्त करके सत्ता को जनकेंद्री और उद्देश्य पूर्ण करने का महत्वपूर्ण कार्य विगत पांच वर्षों में मोदी सरकार ने किया है। आनेवाले पांच सालों में और तेजी एवं असर दिखाना होगा। राजनीति के मायने बदले हुए दिखाई दे रहे हैं। सत्ता का व्याकरण भी बदलता हुआ नजर आ रहा है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं सांसद हैं)