बेड़ियों से मुक्त हुईं मुस्लिम महिलाएं


तीन तलाक पर अध्यादेश

सेकुलरिज्म’ के नाम पर कई राजनैतिक दलों द्वारा वोट बैंक राजनीति में लिप्त रहना भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है। लंबे समय से ‘सेकुलरिज्म’ के विकृत रूप को संरक्षण देने के कारण समाज में रूढ़िवादी तत्व हावी हुए हैं। इससे अनेक सामाजिक कुरीतियां ‘पर्सनल लॉ’ के नाम पर जारी हैं तथा समाज में किसी प्रकार के सुधार में रोड़ा बने हुए हैं। ‘सेकुलरिज्म’ के नाम पर ‘रूढ़िवादी–प्रतिगामी’ तत्वों को जिस प्रकार का संरक्षण मिला है, उससे मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति बदतर हुई है। उन्हें महिला होने के कारण भेदभाव झेलना पड़ता तो है ही, साथ ही बड़ी संख्या में ‘तीन तलाक’ जैसी कुप्रथाओं से उनका जीवन बर्बाद हुआ है। दुर्भाग्य से ऐसा तब होता रहा जब भारतीय संविधान में उन्हें बराबरी का दर्जा प्राप्त है। तुष्टिकरण एवं वोट बैंक की राजनीति का सबसे भयावह पक्ष यह रहा कि न तो इस संबंध में कभी किसी सुधार को प्रोत्साहित किया गया, न ही इस जैसे मुद्दों को कभी आम बहस के केंद्र में आने दिया गया। अभी तक इन कथित ‘सेकुलरिस्ट’ दलों के सोच एवं स्वभाव में कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिला है।

‘तीन तलाक’ पर केन्द्र सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अध्यादेश 2018 एक स्वागत योग्य कदम है। यह अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘तीन तलाक’ पर दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के आलोक में लाया गया है। ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में तीन तलाक को गैरकानूनी एवं असंवैधानिक कहा है। इस अध्यादेश के लागू होने से मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को किसी भी तरह तीन तलाक दिया जाना अपराध माना जायेगा, जिसमें तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। कोई मुस्लिम महिला इस संबंध में यदि पुलिस को शिकायत करती है तब पुलिस इस पर कार्यवाही करेगी तथा पत्नी एवं उसके बच्चों को गुजारा भत्ता मिलेगा, जिसे परिस्थितियों के अनुरूप दंडाधिकारी द्वारा तय किया जाएगा। इसे ‘कंपाउंडेबल अपराध’ की श्रेणी में रखा गया है, ताकि पीड़ित महिला यदि इस संबंध में दंडाधिकारी के समक्ष आवेदन करे, तब समझौते का रास्ता निकल सकता है। इस अध्यादेश से बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं को राहत मिलेगी, जोकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी इस दंश को झेलने को बाध्य थी।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी तीन तलाक पर विधेयक राज्यसभा में अटका हुआ है। वोट बैंक की राजनीति में फंसे कांग्रेस एवं इसके सहयोगी दल सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को भी दरकिनार करना चाहते हैं। यह वही कांग्रेस है जिसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को धता बताते हुए शाहबानो को न्याय नहीं मिलने दिया था। मुस्लिम समाज में रूढ़िवादी तत्वों के तुष्टिकरण में कांग्रेस इस तरह से अंधी हो चुकी है कि उसे संविधान एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी नहीं दिखाई देते और न ही ये मुस्लिम महिलाओं की दुरवस्था ही देख पा रही है। आज जबकि 22 मुस्लिम देश तीन तलाक को किसी न किसी रूप में प्रतिबंधित कर चुके हैं, भारत जैसे ‘सेकुलर’ देश में न केवल यह जारी था, बल्कि इस पर किसी प्रकार की बहस की भी इजाजत नहीं थी। अनगिनत मुस्लिम महिला जिन्होंने तीन तलाक के दंश को झेला है, उनकी जिंदगी बर्बाद करने तथा हर विवाहित मुस्लिम महिला के सिर पर इसे तलवार की तरह लटकाये रखने की जिम्मेदारी से कांग्रेस भाग नहीं सकती।

इस सामाजिक कुप्रथा के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करने वाली महिलाओं का साहस अभिनंदनीय है। अपने इस वीरतापूर्ण संघर्ष से उन्होंने न केवल अपनी जंजीरों को तोड़ा, बल्कि मुस्लिम समाज में परिवर्तन एवं सुधार का मार्ग प्रशस्त किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार इनके संघर्षों में अडिग होकर उनके साथ खड़ी रही और वोट–बैंक की राजनीति की जद से उन्हें आजाद किया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान की मूल्यों की रक्षा तथा महिलाओं को न्याय दिलाने के उसके संकल्प से देश के राजनैतिक विमर्श में सकारात्मक परिवर्तन आया है। परन्तु चिंता का विषय यह है कि कांग्रेस अब भी वोट–बैंक की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रही है। क्या केवल सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से तीन तलाक की कुप्रथा समाप्त हो जाएगी? सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि सरकार की तीन तलाक रोकने के लिए छह महीने के अंदर कानून बनाना चाहिए, लेकिन कांग्रेस के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया। राज्यसभा में इसने इस विधेयक को अटका रखा है। इससे कांग्रेस बेनकाब हुई है। यह अब वोट–बैंक से ऊपर उठने की अपनी इच्छाशक्ति खो चुकी है, फलत: देश की जनता का विश्वास भी इस पर से उठ चुका है।

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             shivshakti@kamalsandesh.org