आत्मिक सुख की आवश्यकता


दीनदयाल उपाध्याय

अंतिम भाग

क बार लखनऊ के अस्पताल में एक लड़का आया था, उसे बहुत पहले भेड़िए उठाकर ले गए थे। भेड़ियों ने ही उसका लालन-पालन किया। इसका फल यह हुआ कि मनुष्य समाज से वह बिल्कुल दूर हो गया। वह भेड़िए की तरह ही बोलता था। खाना भी वह हाथ से नहीं खाता था। ज़बान से लप-लप करके खाना खाता था। जैसे चौपाए चलते हैं, वैसे ही वह चलता था। अब उसमें धीरे-धीरे कुछ परिवर्तन हुए हैं। उसको मनुष्यों में लाकर रखा गया है। उस लड़के का जैसा हाल हुआ, समाज से हटकर हम सभी का वही हाल हो सकता है। समाज के कारण ही हम बोलना, चलना, हंसना सीखते हैं। हमारी बुद्धि का विकास भी समाज के द्वारा ही होता है। यदि समाज न हो तो हम कुछ भी नहीं सीख सकते। हम पिछले ज्ञान से सीखकर नए ज्ञान की ओर बढ़ते हैं।

जैसे प्रारंभ में मनुष्य ने आग का आविष्कार किया होगा। आग जलाना सीखा होगा। उसके लिए न मालूम कितनी बुद्धि लगाई होगी। कितने प्रयत्न किए होंगे। परंतु इतना सब कुछ करने के बाद उसने आग जलाना सीख ही लिया। लेकिन क्या हमें आज इतनी बुद्धि लगानी पड़ती है? नहीं, इसी तरह गुणा, भाग, जोड़, घटा आदि का ज्ञान है। हम हिसाब लगा लेते हैं। लेकिन यह सब आविष्कार किसने किया? शून्य की खोज, जिस प्रकार हम संख्याएं लिखते हैं-इकाई, दहाई, सैकड़ा, हज़ार, यह सब आविष्कार कैसे हुआ? कितने ही लोगों ने अपनी बुद्धि लगाई होगी। यूरोप के लोग जिसका आविष्कार नहीं कर पाए, रोमन न्यूमरल्स यों लिखे जाते हैं। यह आपने देखा होगा। जैसे अंग्रेज़ी का ‘वी’ होता है, उसे पांच कहा जाता है। जबकि हम लोग पंद्रह लिखते हैं तो एक और पांच इस तरह लिखते हैं। यह सब जो चीज़ है, इसके लिए हमें बुद्धि नहीं लगानी पड़ती। लेकिन हमारे लोगों को कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी। इसलिए हम समाज से हटकर यदि जीना चाहें तो नहीं जी पाएंगे।

हम जो कर रहे हैं, उसका फल आगे आनेवाले समय में किसी और को मिलेगा तथा जो हमसे पहले कर गए हैं, उनकी मेहनत का फल हमें प्राप्त हुआ, जो एक धरोहर के रूप में प्राप्त होता चला जाता है। हमारी यात्रा इसी तरह चलती रहती है। यानी हम सब किसी-न-किसी रूप में एक-दूसरे के ऊपर निर्भर होते हैं। व्यक्ति का समाज से घनिष्ठ संबंध है। यदि समाज सुखी नहीं होगा तो व्यक्ति भी सुखी नहीं रह सकता। समाज हमें बहुत कुछ देता है, जिससे व्यक्ति अनजान रहता है। समाज सब चीजें देकर भी ऐसा कुछ नहीं दिखा पाता, जैसे कोई रुक्का लिखा दे। क़र्जा देते समय रुक्का लिखा देते हैं। यानी रुपया दिया तो लिखा लिया कि सौ रुपया दिया, इसके ऊपर पांच रुपए का ब्याज़ लगेगा। इस हिसाब से तुम मुझे वापस कर दोगे। किंतु समाज तो हमसे ऐसा कुछ लिखवाता ही नहीं है। हमें सबकुछ देता चला जाता है। यदि कोई व्यक्ति गंभीरता से सोचे तो उसे लगेगा कि वह वास्तव में समाज का क़र्ज़दार है।

कितनी अच्छी-अच्छी चीजें, अच्छे-अच्छे गुण हैं-ये सब हमें समाज से ही तो प्राप्त होते हैं। हमें समाज का क़र्ज़ चुकाना है, इस तरह का विचार करना चाहिए। हमारी भलाई समाज के साथ ही जुड़ी हुई है। अब यदि भला नहीं होगा तो समाज को उतना ही दुःख होगा। समाज की अवस्था गिरती चली जाएगी। इस प्रकार समाज का कार्य यदि करना है तो समाज के सुख के साथ अपने सुख का विचार करना है। इन दोनों का आपस में बड़ा संबंध है। इस संबंध को हमें अच्छी प्रकार समझना है। परंतु इस संबंध में एक बात ज़रूर है कि आपने समाज का ही विचार किया और व्यक्तिगत विचार बिल्कुल ही नहीं किया तो भी कठिनाई होगी, क्योंकि समाज एक ऐसी स्वाभिव्यक्ति की चीज़ है कि वह जो भी काम करता है, व्यक्तियों द्वारा ही करता है। अकेला समाज भी कुछ नहीं कर सकता।

समाज क्या है? समाज तो दिखाई नहीं देता। यह अमूर्त रूप में है। यह क्रियाशील होता है तो वास्तव में मनुष्यों द्वारा ही क्रियाशील होता है। यद्यपि समाज के सुख में ही व्यक्ति का सुख है, परंतु समाज व्यक्तियों द्वारा ही काम करेगा। जैसे घड़ी है। घड़ी की सुई की जो कुछ सार्थकता है, वह इसी बात में है कि घड़ी ठीक प्रकार से चले। किंतु क्या घड़ी का हम विचार कर सकते हैं, जिसमें सुई न हो, ऐसी कोई घड़ी जिसकी सुई ठीक न हो। वह घड़ी किस काम की।

अगर कोई सोचे कि इसमें सुई की क्या क़ीमत है? केवल घड़ी की क़ीमत है, सुई की कोई क़ीमत नहीं तो ऐसा नहीं है। घड़ी के हर एक पर्जे की कीमत है। स्प्रिंग है। यदि हम समझें कि उसकी कोई कीमत नहीं है। उसे फेंक दो तो घड़ी काम नहीं करेगी। घड़ी का डायल भी ठीक होना चाहिए। सभी पुर्जे ठीक हों और घड़ी के साथ ठीक होने चाहिए। अलग-अलग किसी चीज़ की क़ीमत नहीं। मोटर के बारे में भी यही बात है कि मोटर की अलग-अलग चीज़ों की कोई क़ीमत नहीं। मोटर की हर चीज़ अलग होने से निरर्थक हो जाएगी। लेकिन जब तक उन्हें जोड़ा न जाए, जब तक मोटर ठीक नहीं चलेगी। वह तभी चलेगी जब उसके सभी पुर्जे ठीक होने के साथ-साथ मोटर से जोड़े जाएं। प्रत्येक वस्तु में परस्पर पूरकता का संबंध रहता है। व्यक्ति और समाज का भी ठीक वैसा ही संबंध है।

दोनों का विचार कर चलना चाहिए, अन्यथा सब कुछ अधूरा रह जाएगा। पूर्ण रूप से विकसित न हुआ तो काम नहीं चलेगा। यदि कोई केवल मोटर का ही विचार करे और उसके पुर्जे का विचार न करें तो भी वह अधूरी ही रहेगी और काम नहीं कर सकेगी। जब व्यक्ति और समाज दोनों को सुख प्राप्त होगा, तभी सब कुछ पूर्णता को प्राप्त हो सकेगा। कुछ लोग केवल व्यक्ति का ही विचार करते हैं, समाज का नहीं करते। कुछ समाज का ही विचार करते हैं, व्यक्ति का नहीं करते। हमें एक ही पक्ष का विचार नहीं करना चाहिए? हमें दोनों पक्षों का विचार कर चलना चाहिए। जो लोग सिर्फ़ व्यक्ति का ही विचार करते हैं, वे यह नहीं सोचते कि मनुष्य की स्वतंत्रता क्यों है, किसके लिए है? व्यक्ति का संबंध किसके लिए है। वे यह नहीं सोचते कि जीवन में कौन सी दिशा होनी चाहिए। इस प्रकार से दो बातों का एक प्रकार से एक्सट्रीम विचार लेकर चलने वाले हज़ारों लोग सृष्टि में दिखाई देते हैं। किंतु हमारे यहां पर जो कुछ विचार हुआ वह यह कि व्यक्ति को समाज से अलग नहीं किया जा सकता और न ही बिना व्यक्तियों के समाज जैसी कोई चीज़ है। दोनों का हमें सामूहिक रूप से विचार करना पड़ता है। दोनों का विकास कैसे हो, इसकी चिंता लेकर हम चलते हैं।

इसी तरह व्यक्ति के अंदर भी हमने विचार किया कि व्यक्ति का जीवन केवल भौतिक दृष्टि से, शारीरिक दृष्टि से है, हमें उसका ही विचार करना चाहिए, ऐसा नहीं है। उसकी मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, आध्यात्मिक सब प्रकार की उन्नति का भी विचार करके चलना पड़ता है। इस प्रकार हमें सामूहिक विचार करना पड़ता है। यह पूर्णता जहां होगी, वहां ही हमारा वैभव हो सकता है। जहां यह पूर्णता नहीं, जहां हमारा समाज दुनिया में बदनाम हो गया है, हमारा समाज गुलाम हो गया है, वहां हमें वैभव प्राप्त नहीं हो सकता।

जैसे स्वामी विवेकानंदजी सारी दुनिया में घूम आए और दुनिया में बड़ा नाम कमाया। लोगों ने कहा कि देखा, इतना बड़ा, इतना ऊंचा विद्वान इनके पास है। लेकिन इतना होते हुए भी समाज के प्रतिनिधि के नाते से वे गए। भारत के प्रति लोगों की बड़ी नीची दृष्टि रही। भारत कई सौ वर्षों तक गुलाम था। यदि समाज का बड़ा नाम हो जाए और समाज में रहने वाले जितने भी व्यक्ति हैं, उन्हें किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो, तो वह बड़ा नाम छोटा हो जाएगा। उससे कोई अर्थ नहीं निकलेगा। वह केवल दिखावे की चीज़ हो जाएगी ऊपर से। वास्तविकता उसके अंदर बिल्कुल नहीं होगी। अगर हम उसमें वास्तविकता चाहते हैं तो वह तभी रहेगी जब व्यक्ति और समाज का जो अभिन्नता का संबंध है, उसके आधार पर ही दोनों का विकास हो सके।

जब हम इस नाते से विचार करते हैं तो व्यक्ति के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन और इसी प्रकार से व्यक्ति और समष्टि को सुखी बनाने तथा उनका विकास करने की दृष्टि से। तब हम व्यक्तियों के समूह और अनेक प्रकार की संस्थाओं को निर्मित करते हैं। राज्य भी इनमें से ही एक संस्था है। हमारे यहां पर तो और भी संस्थाएं निर्माण हुई हैं, जैसे हमारे यहां कुटुंब की पद्धति है, पश्चिम में कुटुंब जैसी कोई चीज़ नहीं है। अपने यहां तो विवाह होने के बाद पिता-पुत्र साथ-साथ रहते हैं, लेकिन पश्चिम में विवाह हुआ कि पुत्र और पुत्रवधू अलग हो जाते हैं। फिर उनका पिता के साथ कोई संबंध नहीं रहता। अपने यहां यह चीज़ नहीं है। कुटुंब की पद्धति है, जाति की पद्धति है, वर्णों की पुरानी पद्धति है। अपने यहां पंचायत की पद्धति है और अनेक प्रकार की संस्थाएं हैं। ये संस्थाएं और समाज वास्तव में साधर्म्य का निर्वाह करने के लिए तथा समन्वय को प्रतिस्थापित करने के लिए निर्मित होती रहती हैं। अपने इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए समाज इस प्रकार की अनेक संस्थाओं का निर्माण करता है।

पश्चिम में भी कुछ संस्थाएं ऐसी हैं। पारस्परिक संबंध की दृष्टि से जितना विचार किया जाना चाहिए था। शायद उसमें उतना नहीं किया जाता। जैसे राज्य की संस्था है। यह राज्य की संस्था सारी दुनिया में है। आज भी है, पहले भी थी। पश्चिम ने भी राज्य संस्था निर्माण की है। बाक़ी भी कुछ संस्थाएं हैं, जैसे उपासना पद्धति की दृष्टि से विभिन्न उपासना पद्धति को मानने वाले संप्रदाय के लोग इकट्ठा हो जाते हैं। वह भी उनकी एक संस्था है। जैसे ईसाइयों में चर्च में भी अनेक चर्च हैं। कोई प्रोटेस्टेंट चर्च है, कोई जेसुइस्ट है और बाक़ी के मेथोडिस्ट हैं और अनेक छोटे-छोटे भेद हैं। उन भेदों को लेकर भी सेक्टर्स निर्माण हो गए हैं। इस प्रकार की उपासना पद्धति को मानने वाले कुछ लोग हैं। एक प्रकार की राजनीतिक विचारधारा को लेकर चलने वाले कुछ लोग हैं, इस प्रकार के राजनीतिक स्वार्थों को लेकर पूर्ण करने का प्रयत्न करने वाले कुछ लोग हैं। राजनीतिक पार्टी के रूप में उनका निर्माण हो जाता है। आर्थिक दृष्टि से भी कहीं पर मज़दूरों का संगठन खड़ा है, कहीं पर रुपया लगाने वाले पूंजीपतियों ने भी अपने संगठन बना रखे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में यूनिवर्सिटियां चलती हैं। साहित्यिकों के क्लब निर्माण होते हैं। इस प्रकार के अनेक संगठन पश्चिम में भी निर्माण हुए हैं। आज भी हो रहे हैं, किंतु आज भी उनकी समझ में यह नहीं आया कि इन सब संगठनों का पारस्परिक संबंध क्या होना चाहिए?

ये संगठन वास्तव में किस एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाए गए हैं, इन संगठनों का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए? इस बात का शायद वे ठीक प्रकार से अनुमान नहीं लगा पाए हैं। हमारे यहां भी पहले इस प्रकार के अनेक संगठन चले थे। आज भी उनके कुछ अवशेष विद्यमान हैं। उनमें से आज बहुत कुछ ध्वंस हो गए होंगे। कुटुंब का संगठन है, जाति का संगठन है, वर्ग का संगठन है, उपासना पद्धति के नाते संगठन है। अपने यहां पर चले। ये सभी प्रकार के संगठन हैं। बाक़ी की भी बहुत चीजें रहीं। वास्तव में अनेक रूप हैं। समाज सभी संगठनों द्वारा अपना कार्य पूरा करता है। व्यक्ति भी इन संगठनों के द्वारा अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं। प्रत्येक देश में इस तरह की अपनी-अपनी पद्धति होती है।

हमारे देश के संगठनों में परस्पर समन्वय था, सामंजस्य था। सभी लोग सामंजस्य के ऊपर ठीक-ठीक प्रकार से चलते थे। वे समाज के लिए पूरक बनकर चलते थे। यदि वे आज नहीं चलते हैं तो इसके पीछे कारण सिर्फ इतना है कि उनके पीछे का सामंजस्य समाप्त हो गया है। किंतु इसके पीछे एक तर्क है जिसे गंभीरता से सोचेंगे तो शायद समझ में आ जाएगा कि यह जो अपने जीवन की पूर्णता की कल्पना है, उन कल्पनाओं का आधार लेकर है। हमने इतने प्रकार के भिन्न-भिन्न साधन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही निर्माण किए हैं और प्रत्येक संगठन के पीछे यह जो पूर्णता की कल्पना है, यह पूर्णता कल्पना में निहित है। यह प्रत्येक प्रकार के संगठनों के पीछे हमारी जो जीवन की मूल कल्पना है, उनका सबका विवेचन यहां पर करना नहीं, सिर्फ इतना मानकर चलते हैं कि हमारे यहां पर भी अनेक प्रकार के ऐसे संगठन हैं, जिनकी स्थिति अब जीवंत नहीं है, बल्कि वे एक प्रकार से निष्प्राण होकर चल रहे हैं। फिर सजीव हों या न हों, उसके संबंध में अनेक मत हो सकते हैं। किंतु यह बात सत्य है कि अपने यहां मूल भावना पर विचार करके व्यक्ति और समाज में क्या संबंध है, इसका विचार करके चलें और उसके साथ ही इस दृष्टि से चलाने का विचार करें।
समाप्त

-पाञ्चजन्य, मई 27, 1961, संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : लखनऊ