समाज की सर्वांगीण उन्नति हमारा ध्येय


दीनदयाल उपाध्याय

पिछले अंक का शेष…

क छोटा सा उदाहरण लें कि कोई बच्चा है। हम उसका शृंगार करना चाहते हैं, शृंगार भी हम उसके अनुरूप करेंगे कि वह स्त्री है या पुरुष। यदि वह लड़का है और हमने उसका लड़की जैसा शृंगार कर दिया तो गड़बड़ हो जाएगी। जिसको उसके स्वरूप का ज्ञान होगा, वही उसमें सौंदर्य को खोज सकता है और जिसको उसके स्वरूप का ही ज्ञान नहीं है, वह उसके सौंदर्य का विचार भी कैसे कर सकता है? इसलिए राष्ट्र के धर्म का विचार छोड़कर कोई विचार करने लगेगा तो भगवान् जाने उसकी क्या स्थिति होगी? ऐसा व्यक्ति जब चलता है, तो व्यक्ति जैसे दूसरों से उधार ले-लेकर ही काम चलाता है, उसके पास अपना कुछ नहीं होता, उसकी स्थिति ऐसी हो जाती है। उसको यह मालूम नहीं होता कि कहां चलना है, क्या बोलना है? बाज़ार में जाता है तो पैसे होने के बाद भी वह सोच नहीं पाता कि उसका क्या किया जाए? इसलिए वह कहीं भी जाएगा, अपने आप कुछ नहीं कर सकता। वह स्वयं अपना ध्येय निश्चित नहीं कर पाता। चाहता ज़रूर होगा कि मुझे ध्येय निश्चित करना है। परंतु वह जैसा अवसर मिलेगा, परिस्थितियां जैसी मिलेंगी, उन्हीं के अनुसार वह चलता चला जाता है।

जैसे मकानों के ऊपर एक वेदरकॉक लगा होता है। एक मुर्गा और उसके साथ चार कटोरे लगे रहते हैं। वे कटोरे हवा के साथ घूमते हैं। उनकी कोई निश्चित दिशा नहीं रहती। हवा जिधर से आती है, उधर ही घूम जाते हैं। वे ज्यादा-से-ज्यादा यही बता सकते हैं कि हवा किधर से चल रही है। पूरब से चल रही है या पश्चिम से चल रही है, उत्तर से चल रही है या दक्षिण से चल रही है। उनकी अपनी स्वतः कोई शक्ति नहीं होती। वे कुछ निर्माण करना भी चाहें तो कुछ नहीं कर पाते। वेदरकॉक के समान इधर-उधर के चक्कर लगाने वाले कुछ लोग भी हैं। वे दुनिया को बस यही बता सकते हैं कि अब कैसी हवा चल रही है। यानी वो स्वयं उस हवा में बहते चले जाते हैं। अपनी कोई दिशा निश्चित नहीं कर सकते।

इस प्रकार के लोग वैभव की बात करते हैं, परंतु उन्हें यह पता नहीं है कि वैभव है कहां? इसीलिए आज एक प्रकार का आदर्श सामने रखते हैं, कल दूसरे प्रकार का। अपने राष्ट्र के संबंध में आपको मालूम होगा न कि कितने प्रकार के आदर्श रखे गए हैं। कोई कहता है कि हम तो बिल्कुल असांप्रदायिक राज्य बनाना चाहते हैं। कोई कहता है कि हम कल्याणकारी राज्य बनाना चाहते हैं, क्योंकि समाज व राज्य का वे अलग-अलग विचार नहीं कर सकते। इसलिए राज्य का ही विचार करते हैं। कोई कहता है कि हम यहां पर सब प्रकार से समाजवाद लाना चाहते हैं। इस प्रकार की जो चीजें हैं, उसमें से निश्चित विचार करके न चलकर एक के बाद एक चीज़ आती चली जाती हैं।

मुझे एक छोटी सी कहानी याद आती है कि एक शेखचिल्ली अपने घर से चला। उसे ससुराल जाना था एक विवाह के न्योते पर। वह घर से चलकर ससुराल जाने के लिए निकला। उन दिनों गाड़ियां नहीं हुआ करती थीं और लोग पैदल ही जाया करते थे। उसे काफ़ी दूर पैदल जाना था। इसलिए उसकी मां ने उसे खिचड़ी बनाकर खिलाई। वह खिचड़ी उसे बहुत अच्छी लगी। उसने मां से पूछा कि यह क्या है। उसने बताया कि यह खिचड़ी है। शेखचिल्ली ने सोचा कि ससुराल जाकर वहां भी यही खिचड़ी बनवाकर खाऊंगा। वह रास्ते भर याद करता रहा खिचड़ी-खिचड़ी। रास्ते में आंधी आई। उसकी टोपी हवा में उड़ गई। उसके पीछे भागते-भागते थककर एक जगह बैठ गया। लेकिन इस बीच वह खिचड़ी शब्द ध्यान से निकल गया। वह खाचिड़ी-खाचिड़ी चिल्लाने लगा। थोड़ी दूर चला तो वहां एक किसान अपने खेत पर बैठा चिड़िया उड़ा रहा था। उसने खाचिड़ी-खाचिड़ी सुना तो उसे बहुत गुस्सा आया। उसने कहा कि तू यह क्यों कह रहा है, तब उसने कहा कि मैं और क्या बोलूं। किसान ने उसे बताया कि उड़ चिड़ि-उड़ चिड़ि कहना चाहिए। अब वह उड़ चिड़ि कहता चला जा रहा था कि एक बहेलिया चिड़िया पकड़ने के लिए जाल बिछाए बैठा था। उसकी बात सुनकर उसे गुस्सा आया। बहेलिये ने उसे समझाया कि उसे कहना चाहिए ‘आते जाओ-फंसते जाओ’। अब शेखचिल्ली कहने लगा, ‘आते जाओ-फंसते जाओ।’ लेकिन रास्ते में उसे कुछ चोर मिले। उन्होंने समझा कि वह उन्हें ही कह रहा है। उन्होंने गुस्से से उसे पीटा और कहा कि कहो, ‘लाते जाओ, रखते जाओ।’ वह आगे चलता जा रहा था और कहता जा रहा था कि लाते जाओ और रखते जाओ। कुछ लोग गांव से एक मुरदा लेकर जा रहे थे। उन्होंने शेखचिल्ली की बात सुनी तो उन्हें बहुत बुरा लगा। वे सब उसे पीटने को तैयार हो गए। तब शेखचिल्ली ने कहा कि मैं ऐसा न कहूं, तो क्या कहूं। उन्होंने उसे समझाया कि तुम्हें कहना चाहिए कि ‘बहुत बुरा हुआ, ऐसा किसी के यहां न हो’। तब वह यही कहते-कहते ससुराल पहुंच गया। ससुराल में शादी थी साले की। वहां के लोगों ने उसकी बात सुनी तो उन्हें गुस्सा आया कि यह क्या कह रहा है। उसकी पत्नी भी रोने लगी। जब वह अपनी पत्नी के पास गया तो उसने बताया कि उसे कहना चाहिए कि बहुत अच्छा हुआ, ऐसा सभी के यहां हो। तो कई बार ऐसा हो जाता है कि लोग अपना ध्येय भूल जाते हैं।

जिनको इस बात का पता नहीं कि हम कौन हैं, हमें किधर जाना है? आख़िर जब वैभव का पता ही नहीं होगा, तब हम उसे कैसे पा सकेंगे? गधे का वैभव घोड़े को देने और घोड़े का वैभव गधे को देने से गड़बड़ हो जाती है। घोड़े की जीन गधे पर कसकर और उसे युद्धभूमि में खड़ा कर दिया जाए तथा घोड़े के ऊपर बरतन लादकर उसे कुम्हार का काम दे दिया जाए तो क्या हाल होगा। दोनों का वैभव अलग-अलग है। दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए दोनों के गुण भी अलग-अलग हैं। आख़िर करेला कड़वा ही होगा। यही उसकी विशेषता है और ईख मीठी ही होनी चाहिए। अब यदि ईख में कड़वापन आ जाए और करेले में मीठापन। कल्पना कीजिए, मीठी चीज़ अच्छी है, लेकिन नीम में मिठास आ जाए, ईख कड़वी हो जाए तो समस्या हो जाएगी। ईख का गुण इसी में है कि वह मीठी हो, नीम कड़वा ही होगा और नीबू खट्टा ही होगा। गरमी के दिनों में जाड़ा पड़ने लगे तो एकाएक बीमारियां फैल जाती हैं। कभी-कभी ऐसा हो जाता है। वर्षा में पानी न पड़े तो क्या हाल होगा? अनावृष्टि के कारण सब लोग चिल्लाएंगे कि पानी पड़ना चाहिए। लेकिन ज्यादा वर्षा से भी तक़लीफ़ होती है। बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता है, छाता लगाकर निकलना पड़ता है। कितनी कठिनाइयां होती हैं। फिर भी यदि उन दिनों में बरसात न हो तो परेशानी हो जाएगी। शीतकाल आ जाए और फिर भी गरमी लगे, तो कल्पना कीजिए कि क्या हाल हो जाएंगे?

वास्तव में जैसे हर ऋतु है, उसका वैभव उसी ऋतु में प्रकट होगा। हर प्राणी का अपना वैभव है। उसी प्रकार हर राष्ट्र का अपना वैभव होता है और राष्ट्र का यह वैभव उसके धर्म के साथ अवस्थित है। इसलिए हमने कहा ‘विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्’इस धर्म का संरक्षण करके हमें वैभव प्राप्त कराओ। इन दोनों को अलग नहीं किया। हम ऐसा कभी न सोचें कि हमने यह एक एक्स्ट्रा चीज़ मांगी है। ऐसी बात भी नहीं कि भाई, चलो मांगने निकले ही हो तो एक चीज़ के साथ एक चीज़ और मांग लें। वैभव के साथ-साथ धर्म भी मांग लें तो अच्छा रहेगा। लेकिन धर्म के संरक्षण में ही हमारा वैभव है। यदि धर्म का संरक्षण नहीं, तो वास्तव में हमें किसी भी प्रकार का वैभव प्राप्त नहीं हो सकता। यही बात हम मानकर चले हैं। वास्तव में ये दोनों चीजें एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं कि एक के बिना दूसरा चल नहीं सकता। धर्म का संरक्षण हुआ तो वैभव मिलेगा और वैभव प्राप्त होगा तो धर्म के संरक्षण से ही होगा।

एक प्रश्न इस बारे में प्रकट होता है कि आख़िर यह धर्म क्या है? यह एक बड़ी समस्या सामने आ जाती है कि धर्म क्या है? धर्म को लेकर कई बार झगड़े भी हो जाते हैं। धर्म को लेकर लोगों के मन में अनेक धारणाएं हैं। कभी इसका अर्थ यह रखा जाता है कि यदि वेद का कोई मंत्र किसी हरिजन के कान में पड़ गया तो यह अधर्म हुआ। धर्म के लिए कितने ही भाव लगाए गए हैं, जिससे इसका भाव इतना विकृत हो गया है कि इसके कई अर्थ हो गए। कुछ लोग छुआछूत को ही धर्म मानने लगते हैं, जिसके कारण बहुत से लोग कहते हैं कि बाबा, हमें इस धर्म से बचाओ। इस बारे में एक बात है कि एक बार सूरदासजी से एक सज्जन ने पूछा कि सूरदासजी, खीर खाओगे। सूरदासजी ने कभी खीर नहीं खाई थी। उन्होंने पूछा कि भाई, खीर कैसी होती है? तो उन सज्जन ने बताया कि यह सफ़ेद होती है। अब सूरदासजी तो जन्म से ही अंधे थे। उन्होंने सफ़ेद भी नहीं देखा था। उन्होंने पूछा कि सफ़ेद क्या होता है? तब उन्हें बताया कि बगुले जैसा होता है। सूरदासजी ने बगुला भी नहीं देखा था। बोले, बगुला कैसा होता है? तब उन्होंने अपना हाथ थोड़ा टेढ़ा करके बताया कि ऐसा होता है। सूरदासजी ने उनका हाथ टटोलकर देखा तो वह टेढ़ा लगा और सोचा कि बगुला ऐसा होता है। फिर उन्होंने कहा कि नहीं भाई, ऐसी टेढ़ी खीर मुझे नहीं खानी।

तो इसी तरह धर्म के भी लोगों ने कई अर्थ लगा लिये हैं। लोगों ने समझा कि यह धर्म भेदभाव करने वाला है। यह धर्म कोई ऐसी चीज़ होगी, जो लोगों को आपस में अलग-अलग कर देती है। कई बार लोगों ने धर्म के नाम पर ग़लत काम किए, जैसे सही सिक्के के साथ खोटा सिक्का मिलाकर दे दिया। ऐसे स्वार्थी लोग तो दुनिया की हर अच्छी चीज़ का लाभ उठाते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि कुछ दुअन्नियां ख़राब आ गईं। एक रिक्शे वाले को मैंने दुअन्नी दी। उसने देखा और कहा कि बाबूजी, यह नहीं चाहिए। मैंने कहा कि यह तो ठीक है। वह बोला कि मुझे नहीं मालूम, पर यह दुअन्नी चलती नहीं है। मैंने कहा कि यह तो सरकार की बनाई हुई है। मैंने इसे नहीं बनाया है, तुम इसे नहीं लोगे तो यह क़ानूनी जुर्म है। रिक्शेवाला हाथ जोड़कर बोला कि बाबूजी, क़ानून-वानून तो मैं नहीं जानता, पर यह बाज़ार में चलती ही नहीं। आप हमें चवन्नी दे दीजिए हम आपको कुछ और दे देंगे, आठ पैसे वापस कर देंगे। यानी यह जो चीज़ है तो अब इसके कारण वह जो अच्छी दुअन्नी है वह भी चलनी मुश्किल हो जाती है। क्योंकि खोटा पैसा जब इतना ज्याददा चल जाता है तो वह अच्छे पैसे को चलन से बाहर कर देता है। यह नियम है अर्थशास्त्र में। जिन लोगों ने पढ़ा होगा, उन्हें याद होगा।

क्रमश:…
— पाञ्चजन्य, मई 26, 1961, संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : लखनऊ