समाज की सर्वांगीण उन्नति हमारा ध्येय


दीनदयाल उपाध्याय

माननीय रज्जू भैया ने हमें यह बताया था कि एक ऐसी परंपरा हम देश में निर्माण करना चाहते हैं कि जो सत्ता से अलिप्त रहते हुए उसके ऊपर अंकुश रखते हुए सतत चलती जाए और इस प्रकार सत्ता को सही मार्ग पर चला सके। हमें परंपरा के उस स्वरूप का विचार करना पड़ेगा। साथ ही हम जिनका नियंत्रण करना चाहते हैं, जिनका मार्गदर्शन करना चाहते हैं, उसका भी थोड़े-बहुत अंशों में विचार करना पड़ेगा, क्योंकि यदि हमें इसके स्वरूप का ठीक प्रकार से ज्ञान न रहा तो आख़िर हम नियंत्रण क्या करेंगे? सत्ता को किस दिशा में ले जाएंगे ?

नहीं तो ऐसा भी हो सकता है, जैसाकि कहा है-’अन्धेनेव नीयमाना यथान्धाः’ कि अगर अंधे को अंधा ही मार्ग दिखाए, तो वह उसे कहां ले जाएगा? संभवतया गड्ढे में पटक देगा। तो उस नाते से हमें इस बात का कुछ-न-कुछ विचार अवश्य ही करना पड़ेगा कि हम संपूर्ण समाज का मार्गदर्शन करना चाहते हैं, तो हम संपूर्ण समाज को किधर ले जाएंगे? समाज के भिन्न-भिन्न अंग हैं। समाज के कल्याण की दृष्टि से जो उसके भिन्न-भिन्न साधन हैं, वे साधन किस प्रकार से काम करेंगे, उनका ध्येय कौन सा होगा? इन सब बातों का हमें कम-से-कम स्वयं विचार करना चाहिए। इनका हमें स्वयं ज्ञान होना चाहिए, जिनसे कि हम अलिप्त रह सकते हैं। वैद्य तो स्वयं औषधि नहीं लेता किंतु रोगी के संबंध में वैद्य को पूरे तरीके से पता रहता है, साथ ही औषधि के गुणदोषों का भी उसको ज्ञान रहता है। फिर उसको यह आवश्यक नहीं कि वह स्वयं औषधि ले। संभवतः उसे औषधि लेनी ही नहीं चाहिए, जो वैद्य स्वयं औषधि लेने लग जाएगा और सोचेगा कि यह औषधि तो बहुत मीठी है, बहुत अच्छी है, इसे रोगी को न देकर मैं स्वयं ही खा लूं तो अच्छा रहेगा। अब जब वह वैद्य रोगी के बदले उस मीठी औषधि को स्वयं ही खाने लगेगा, सोचो कि उस वैद्य का क्या होगा? रोगी तो मरेगा ही, लेकिन शायद वह वैद्य भी नहीं बचेगा। तो इसलिए यह औषधि स्वयं लेने की आवश्यकता नहीं, किंतु उन औषधियों के गुण-दोष से परिचित होना आवश्यक है। रोगी के संबंध में भी थोड़ा सा ज्ञान होना आवश्यक है। तभी जाकर वह उस रोगी को ठीक कर सकेगा।

इसी प्रकार हमें समाज के सभी पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है कि इस समाज को हम कहां ले जाना चाहते हैं, किस दिशा में बढ़ाना चाहते हैं? जब हम इस बात का विचार करते हैं तो हमें पहले यह सोचना पड़ेगा कि ऐसा कौन सा ध्येय होना चाहिए, जिस ध्येय की ओर हम स्वयं चलेंगे, जिस ध्येय की ओर हम दूसरों को चलाएंगे, उन्हें चलने की प्रेरणा देंगे। इस बात का विचार करें कि आख़िर हम चाहते क्या हैं? नहीं तो अनेक बार लोग कह सकते हैं कि भाई, संघ के लोग क्या काम करते हैं? यह संघ के लोग अपनी शाखाएं लगा लेते हैं, प्रार्थना करते हैं, समता वगैरह का कार्यक्रम कर लेते हैं, राइट-लेफ्ट कर लेते हैं, बाक़ी और इसमें क्या है? हम लोग इस बात के संबंध में अधिक आग्रह भी करते हैं और लोगों से कहते हैं कि शाखा पर आओ और शाखा के हमारे जो कार्यक्रम हैं, उन कार्यक्रमों को करो। यह आग्रह हमारा सही है, आवश्यक है, क्योंकि उसके द्वारा ही हम जिस चीज़ को चाहते हैं, जिस अवस्था को चाहते हैं, उस अवस्था का निर्माण करना संभव होगा।

इस आग्रह के परिणामस्वरूप बहुत बार लोग ऐसा सोचते हैं कि इतना ही इनका काम है। अगर इतना ही हमारा काम है तो अंत में हम क्या इस समाज की ऐसी अवस्था की कल्पना करते हैं कि लोगों को केवल शाम-सबह शाखा पर आकर खेल-कद और थोड़े-बहुत कार्यक्रम करने के बाद आराम से सारा दिन घर पर बैठना चाहिए? क्या इस अवस्था को आदर्श अवस्था कह सकते हैं? ऐसी अवस्था के बाद बाक़ी का कुछ करने को नहीं रहेगा। इसलिए इन बातों पर हमें विचार करना ही पड़ेगा कि हमारा ध्येय क्या है? जब हम विचार करते हैं तो हमारा ध्येय निश्चित हो जाता है। संघ के हर स्वयंसेवक को पता है, जब हम प्रतिज्ञा लेते हैं, तब अपने इस ध्येय का उच्चारण करते हैं कि हम अपने समाज की सर्वांगीण उन्नति चाहते हैं। समाज की सर्वांगीण उन्नति के लिए ही हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घटक बने हैं। हमने समाज का कोई भी क्षेत्र खाली नहीं छोड़ा। कोई क्षेत्र अधूरा या हमसे अछूता नहीं है। समाज में जितनी भी चीजें हैं, उन सब चीज़ों पर हम लोग विचार करके चलते हैं, क्योंकि हमें सब प्रकार की उन्नति करनी है।

इस उन्नति के साथ-साथ हमने थोड़ा सा उसका स्वरूप भी सोचा है। उन्नति शब्द कहना सरल है और ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा कि जो यह कहेगा कि उसे यह उन्नति नहीं चाहिए। जो काम करने के लिए आगे बढ़ा है, वह तो यही कहेगा कि ठीक है, मैं सब कुछ चाहूंगा और सब प्रकार की उन्नति करूंगा, सब प्रकार से समाज को आगे ले जाऊंगा। आज भी देश में जो-जो लोग काम कर रहे हैं और वे किसी भी मार्ग से चल रहे हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो कहता हो कि हम समाज को अधूरा छोड़कर चलेंगे। वह तो समाज की सब प्रकार की उन्नति करने का दावा करते हैं। इसलिए हमने इस बात की थोड़ी सी व्याख्या की है।

व्याख्या करते समय हमने यह कहा है कि हमारी जो समाज की उन्नति होगी, उसमें यहां का समाज, यहां की संस्कृति, यहां का धर्म, उसका संरक्षण करके हम समाज की उन्नति करेंगे। हमने दोनों को एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। अपने धर्म और संस्कृति को हटाकर समाज की उन्नति की कोई कल्पना हमारे सामने नहीं आती। हमारे सामने तो समाज की उन्नति की वह कल्पना आती है, जिसमें हमारे धर्म और संस्कृति का आधार रहेगा। धर्म और संस्कृति का संरक्षण होगा, वही हमारी उन्नति है। जिसमें धर्म और संस्कृति का संरक्षण नहीं होगा, उसको हम उन्नति मानकर ही नहीं चलें।

यही बात रोज़ अपनी प्रार्थना में भी कहते हैं, वहां भगवान् से जब मांगते हैं तो अपनी प्रार्थना के अंत में यह भाव हम व्यक्त करते हैं कि हमारी यह जो विजयशालिनी संघ शक्ति है, वह इस राष्ट्र के धर्म का संरक्षण कर हमें परम वैभव के पद पर ले जाने में आपके आशीर्वाद से सफल हो। हम मांगते हैं कि परम वैभव और सर्वांगीण उन्नति में कोई अंतर नहीं, क्योंकि जब सर्वांगीण उन्नति होगी तो हमें परम वैभव प्राप्त हो जाएगा। हमें बाक़ी के वैभव नहीं चाहिए। राष्ट्र के धर्म का संरक्षण करके हमें यह वैभव मिलना चाहिए। राष्ट्र के धर्म को छोड़कर, उसका विनाश कर, उसे भुलाकर हमें परम वैभव मिले तो हम कहेंगे कि ऐसा परम वैभव ठीक नहीं है।

तो वास्तविकता यह है कि हमारा जो ध्येय रहता है, उसे लेकर ही हम बाक़ी की बातों पर विचार करें। बहुत से लोग सोचते हैं कि हमारी उन्नति हो जानी चाहिए। वे यह नहीं सोचते कि उन्नति के लिए कुछ-न-कुछ आधार चाहिए। यानी राष्ट्र का धर्म जो कि इस उन्नति का आधार है। इस बात का वे लोग विचार नहीं करते, केवल उन्नति ही चाहते हैं कि जैसे पेट भर जाए, परंतु भोजन न करना पड़े। अगर ऐसी कोई कल्पना हो कि पेट भर जाए और भोजन न करना पड़े या फिर शक्ति आ जाए और उसके लिए कोई व्यायाम न करना पड़े। बाक़ी हाथ-पैरों के अंदर जो कछ थोड़ा-बहुत रक्त है। वह भी किसी प्रकार न प्रकट हो और बल आ जाए। यह संभव नहीं है। हालांकि दोनों की उन्नति का राष्ट्र के धर्म के साथ घनिष्ठता का संबंध है। इन दोनों को हटाकर विचार नहीं कर सकते। किंतु बाक़ी के लोग जो धर्म का विचार नहीं करते और विचार केवल इस बात का करते हैं कि हमारे राष्ट्र का वैभव हो जाए।

इस धर्म का विचार न करते हुए चलने वाले भी दो प्रकार के लोग हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है। वे धर्म को वैभव के लिए आवश्यक नहीं समझते, अनावश्यक भी नहीं मानते और कहते हैं कि रहा तो ठीक, न रहा तो ठीक। इसका वैभव के साथ कोई संबंध नहीं। दूसरे प्रकार के लोग ऐसे हैं, जो राष्ट्र के वैभव के लिए धर्म को अनावश्यक ही नहीं, हानिकर मानते हैं और ऐसा समझकर चलते हैं कि राष्ट्र को यदि वैभव प्राप्त करना है तो इसका जो धर्म चला आ रहा है, इस धर्म को समाप्त करना पड़ेगा। इसे नष्ट करना पड़ेगा, इसे नष्ट करके ही राष्ट्र को वैभव प्राप्त होगा। जब तक राष्ट्र का यह धर्म चलता रहेगा, तब तक किसी भी प्रकार से वैभव प्राप्त नहीं होगा, ऐसा विचार करनेवाले लोग हैं।

ये जो दो प्रकार के विचार वाले लोग हैं, कहना पड़ेगा कि वास्तव में उन्होंने शायद धर्म के स्वरूप को भी नहीं समझा। उनके सामने वैभव की कल्पना भी किसी प्रकार से स्पष्ट नहीं है। इसलिए वे बेचारे अज्ञान के कारण ऐसा सोचकर चलते हैं कि यह धर्म जो है, हानिकारक है। धर्म को समाप्त कर देना चाहिए, इसे समाप्त कर देंगे तभी शायद इसका वैभव प्राप्त होगा। यह एक उलटा ही विचार करनेवाली चीज़ है। जैसे कि कोई अग्नि के बारे में विचार करे कि अग्नि बड़ी प्रज्वलित हो जाए, परंतु उसमें दाहकता न रहे। तो यह कैसे हो सकता है? बिना दाहकता के अग्नि कभी प्रज्वलित नहीं हो सकती। अग्नि यदि प्रज्वलित होगी तो उसके अंदर दाहकता रहेगी ही, क्योंकि दाहकता अग्नि का धर्म है। यदि दाहकता को निकाल दिया और दाहकता निकालने के बाद हमने यदि अग्नि का विचार किया तो फिर वह अग्नि अग्नि नहीं रहेगी।

उसी प्रकार से राष्ट्र को जो कुछ भी धर्म है, उस धर्म को निकालकर यदि हम सोचेंगे तो फिर हमारे सामने बड़ी समस्या हो जाएगी। यहां तक कि हमारा वैभव कहां है? वैभव क्या है? इसका भी हम ठीक प्रकार से निर्धारण नहीं कर सकेंगे, क्योंकि आख़िर को यह भी तो बड़ा महत्त्व का प्रश्न है कि वैभव क्या है, किसको हम वैभव कहेंगे? किस अवस्था को वैभव माना जाए। यह एक बड़ा गंभीर प्रश्न है। इसका उत्तर साधारणतया नहीं दिया जा सकता। इसका उत्तर देने के लिए वास्तव में जिसे धर्म की कल्पना है, जिसको राष्ट्र की प्रकृति की कल्पना है, जिसे राष्ट्र क्या है, इसका पता है, जो इस राष्ट्र को पहचानता है, जो इस राष्ट्र की आत्मा को पहचानता है, वास्तव में वही उसके वैभव का विचार कर सकेगा। जिसको राष्ट्र का पता नहीं है, वह उसके वैभव का विचार भी क्या कर सकेगा? क्रमश:…

— पाञ्चजन्य, मई 26, 1961, संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : लखनऊ