सियासी सफर के साथी का जाना


एम. वेंकैया नायडू

स माह की 11 तारीख को दिल्ली के एक अस्पताल में अपने पुराने प्रिय मित्र अरुण जेटली से मिलने गया तो मुझे उम्मीद थी कि वे जल्द ठीक हो जाएंगे। उनका हाथ मेरे हाथों में था, उन्होने मुझे देखा और यह जताया कि सब ठीक हो जाएगा। यह उम्मीद नहीं थी कि यह उनके साथ आखिरी बार हाथ मिलाना होगा। मुझे उम्मीद नहीं थी कि अरुण जेटली इतनी जल्दी हमेशा के लिए अलविदा कह देंगे। मैं इस सच्चाई से सामंजस्य नहीं बना पा रहा हूं कि वे अब कभी भी काम पर वापस नहीं आएंगे और हमेशा की तरह जरूरत के वक्त, मैं उन्हें तलाश नहीं पाऊंगा।

मैंने अपने कॉलेज के दिनों में एक साथ आने के बाद 40 वर्षों से उनके प्रबुद्ध परामर्श और बुद्धिमत्ता पर भरोसा किया है। हम पहली बार 1974 में छात्र यूनियन अध्यक्षों के सम्मेलन में मिले, जहां जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और मैं आंध्र विश्वविद्यालय से था। तब से हम दोनों आपसी सम्मान और निर्भरता के एक मजबूत बंधन से समन्वित अपनी राजनीतिक यात्रा के सुख-दु:ख के साथी रहे हैं। मैं इस तरह एक प्रिय मित्र के असामयिक निधन से टूट गया हूं, क्योंकि भाग्य ने फिर से अपनी क्रूरता दिखाई है।

अरुण जेटली बहुमुखी प्रतिभा से समन्वित और बहुआयामी पांडित्य के धनी थे। 66 साल के जेटली को समकालीन भारत के व्यापक रूप से स्वीकृत राजनीतिज्ञों में से एक के रूप में जाना जाता है। जेटली अपने विचारों की स्पष्टता, दृढ़ विश्वास, प्रभावी सम्प्रेषण कौशल और प्रासंगिकतापूर्ण प्रस्तोता के रूप में अग्रणी रहे। वह पार्टी और सरकार के लिए समकालीन युग के सबसे प्रभावी प्रवक्ता के रूप में उभरे। उनके निधन से राष्ट्र ने एक महती ओजस्वी आवाज खो दी है।

लंबे समय तक कानून के अध्ययन और अभ्यास और उनकी कुशाग्रता ने जेटली को योग्यता के आधार पर तर्कपूर्ण जीत प्राप्त करने की शक्ति प्रदान की। राजनीतिक दायरे के पार उनके राजनीतिक साथियों ने यह उदारतापूर्ण स्वीकार किया कि कोई संभवत: उनके सभी बिंदुओं पर सहमत न हो, लेकिन वह उनके प्रबल दृष्टिकोण की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता है। वे इस व्यापक मान्यता के योग्य थे। जेटली अपने उन महत्वपूर्ण मंतव्यों के लिए सभी के लिए यादगार रहेंगे, जिन्हें वे सार्वजनिक और संसदीय संभाषण के रूप में सभी प्रमुख मुद्दों पर प्रस्तुत किया करते थे। विभिन्न मुद्दों पर उनके नियमित ब्लॉग, सूचनात्मक और सुरुचिपूर्ण हुआ करते थे।

जेटली की बहुआयामी प्रतिभा को तेजी से पहचान मिली। 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष बनने के बाद जेटली 1977 में आपातकाल के बाद स्थापित जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सबसे कम उम्र के सदस्य थे। तब से वे हमारे देश के राजनीतिक भंवरों में एक स्थिर व्यक्तित्व के रूप में विद्यमान रहे हैं। वे 1991 से भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे, जो कई मायनों में पार्टी के लिए उनके योगदान की साक्षी है। जब मैं पार्टी अध्यक्ष था, तो मैंने उन्हें सुषमा स्वराज के साथ पार्टी के संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया, जो पार्टी का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय था। मुद्दों की अपनी समझ और प्रलेखन कौशल के साथ जेटली ने इन सभी वर्षों में अपनी पार्टी के लिए कई संकल्पों को लेखबद्ध किया।

जेटली ने उन सभी मंत्रालयों में अपनी खुद की एक छाप छोड़ी जो उन्होंने कई वर्षों में संभाले थे जिनमें वित्त और कॉर्पोरेट मामले, रक्षा, वाणिज्य और उद्योग, जहाजरानी, विनिवेश और सूचना और प्रसारण थे। उन्होंने धन शोधन और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कानूनों के अलावा जीएसटी अधिनियम, दिवाला और दिवालियापन संहिता सहित आर्थिक परिवर्तन की भरपाई के लिए कई विधानों को संचालित किया था। उन्होंने एक नाजुक समय में 2014-19 के दौरान देश के वित्त मंत्री के रूप में की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बड़ी निपुणता से संभाला था।

जब 2009 में राज्यसभा में विपक्ष के नेता का मुद्दा सामने आया, तो उनके द्वारा इसे स्वीकार किए जाने से पहले हम दोनों ने इसके लिए एक-दूसरे को चुने जाने पर जोर दिया था। उस शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्होने महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने में उच्च सदन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राज्यसभा में सदन के नेता के रूप में अध्यक्ष रूप में मेरे लिए वे एक बड़े समर्थन के रूप में थे। वे एक उत्कृष्ट रणनीतिकार थे, जो यह जानते थे कि कब कठिन निर्णय लेने का वक्त है और दूसरे पक्ष को समायोजित करते हुए कब उसे कार्यान्वित करना है।

जेटली हमारे देश के संविधान की भावना से संप्रेरित हृदय से लोकतंत्रवादी थे और उसके अधीन वहां के नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों के कट्टर संरक्षक थे। बहुतों को यह याद नहीं होगा कि जेटली नागरिक अधिकारों के आंदोलन में सक्रिय थे और पीयूसीएल बुलेटिन शुरू करने में मदद कर रहे थे। वे 1977 में लोकतांत्रिक युवा मोर्चा के संयोजक भी थे। आपातकाल का विरोध करने के कारण उन्हें मेरी तरह 19 महीने की जेल हुई थी।

अपने सार्वजनिक जीवन के शुरुआती दिनों से जेटली भ्रष्टाचार के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने 1973 में जय प्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सक्रिय रूप से भाग लिया। बाद में उन्होंने जन लोकपाल के लिए अन्ना हजारे के अभियान का समर्थन किया। इस प्रतिबद्धता ने ही जेटली को वित्तीय अनियमितताओं और अपराधों के खिलाफ संसद के कुछ विधेयकों का पुरोधा बना दिया। जेटली ने स्वयं को एक उत्कृष्ट सांसद और प्रखर प्रवक्ता के रूप में प्रस्तुत किया। 2014-19 के दौरान, वह संसद के भीतर और बाहर सरकार के सबसे प्रभावी संप्रेषक थे, जिन्होंने सभी प्रमुख सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने विचार और दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। उनके पास सरकार और उनकी पार्टी की बुनियादी स्थिति और दृष्टिकोण से समझौता किए बिना समाधान प्रस्तुत करने की सहज और अद्वितीय क्षमता थी। मैंने उन्हें राज्यसभा में सदन के नेता के रूप में ऐसा करते देखा है जब भी वहां कोई गतिरोध उत्पन्न हुआ था।

जो बात जेटली को औरों से अलग बनाती है, वह थी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी समझ और इस पर उनकी अभिव्यक्ति। उनकी गहरी बौद्धिक और विश्लेषणात्मक क्षमताओं और प्रासंगिकतापूर्ण विषय प्रस्तुति ने उन्हें एक प्रभावी आवाज की पहचान दी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। दु:ख की बात है कि वह आवाज अब हमारे साथ नहीं है। लेकिन उनकी विरासत सभी संबंधित लोगों का मार्गदर्शन करती रहेगी। इस साल आम चुनावों के बाद जेटली ने अपने स्वास्थ्य के कारण सरकार से बाहर होने का विकल्प चुना क्योंकि वे ऐसा कोई पद नहीं चाहते थे जिसका वह पूर्ण निर्वाह न कर सकें। यह एक दुर्लभ चारित्रिक वैशिष्ठय है।

निजी तौर पर, हम दोनों अच्छे भोजनप्रेमी थे। शुरुआती दिनों में, हम सभी लोकप्रिय रेस्तरां में जाते थे और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का लुत्फ उठाते थे। सभी अवसरों पर मेरे निवास पर उनका नियमित आथित्य होता। उनका घर एकमात्र ऐसा स्थान था जहां मैं सामाजिक-सांस्कृतिक अवसरों पर और व्यक्तिगत रूप से जाता था। भोजन करते समय हम विभिन्न उभरते मुद्दों पर बात किया करते थे और विचारों का आदान-प्रदान करते थे। हमारी नियमित बैठकें भोजन और चिंतन, दोनों के लिए थीं।
अगस्त का यह महीना अरुण जेटली और इससे पहले सुषमा स्वराज और जयपाल रेड्डी को खोने से बहुत कम समय में बहुत अधिक तनावपूर्ण रहा है। तीनों ही योग्यतासिद्ध नेता थे और उत्कृष्ट सांसद होने के अलावा सार्वजनिक जीवन में योगदान भी देते थे।

मैं लंबे समय तह आत्मिक साथी अरुण जेटली को हमसे दूर ले जाने वाली नियति से हृदय से आहत हूं। यह व्यक्तिगत और राष्ट्रीय दोनों रूप में क्षति है। उनकी आत्मा को शांति मिले।

(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)
(हिंदुस्तान से साभार)