राजनीतिक विकेंद्रीकरण का ही दूसरा नाम प्रजातंत्र है


दीनदयाल उपाध्याय

ब कोई व्यक्ति आजादी चाहता है तो वह सुरक्षा की मांग भी करता है। एक व्यक्ति को सुरक्षा देने के लिए आपको दूसरे की कुछ आज़ादी कम करनी पड़ती है। इस प्रकार व्यावहारिक रूप से स्वतंत्रता का अर्थ है कुछ अंकुश लगाना। ये बंदिशें क्या होंगी, यह स्थितियों की आवश्यकता पर निर्भर है। परंत एक व्यवस्थित समाज में हर व्यक्ति को इन सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए। जिस तरह के रोक लगाने की जरूरत पड़ सकती है, उनका अनुमान किया जाना चाहिए और व्यक्ति विशेष को गतिविधि के लिए अधिकतम आजादी दी जानी चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि व्यक्ति की सुरक्षा के नाम पर व्यक्ति की उद्यमशीलता नष्ट न हो जाए और न ही अत्यधिक सुरक्षा उसके विकास की क्षमताओं को पंगु बना दे। इस प्रकार एक संतुलन बनाना आवश्यक है। हम इसे ‘मर्यादाओं का निर्माण कहते हैं। ‘मर्यादाएं’ व्यक्ति विशेष का समाज में दायित्व, समाज में जीवन-मूल्य निर्धारित करती हैं।

शक्तियों का अधिकाधिक केंद्रीकरण ही व्यक्तियों की स्वतंत्रता को नष्ट करता है। बढ़ते हुए केंद्रीकरण पर रोक लगानी चाहिए। वंशानुगत शासकों के हाथ में अथवा तानाशाहों के हाथ में शक्ति का केंद्रीकरण सदा लोगों को राजनीतिक आज़ादी से वंचित करता है। यह हो सकता है कि एक अच्छा शासक या परोपकारी तानाशाह, लोकहित को सर्वोपरि रखे, परंतु यह भी राजनीतिक क्षेत्र में लोगों की पहल को समाप्त कर सकता है। एक राष्ट्रीय सरकार, जिसे जनता ने मतदान से चुना है, जरूरी नहीं कि राजनीतिक प्रजातंत्र को सुनिश्चित करे, यदि वहां जरूरत से ज्यादा शक्तियों का केंद्रीकरण और एकीकरण है। सब कुछ विकेंद्रित करना होगा। विकेंद्रीकरण का अर्थ सत्ता का हस्तांतरण अथवा प्रत्यायोजन नहीं है। यह तो पुराने अडयार के वट वृक्ष की तरह है, जिसमें जड़ें और तने में भेद नहीं दिखाई पड़ता। राष्ट्रीय सरकार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्व निभाने चाहिए तथा नागरिकों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों में कम-से-कम हस्तक्षेप करना चाहिए। ये सब अनिवार्य रूप से स्थानीय सरकार के जिम्मे रहना चाहिए। राजनीतिक विकेंद्रीकरण का ही दूसरा नाम प्रजातंत्र है।

एकाधिकारवाद एवं समूहवाद

राजनीतिक क्षेत्र की तरह आर्थिक क्षेत्र में भी एकाधिकारवाद अथवा समूह तंत्र द्वारा सत्ता का विकेंद्रीकरण आर्थिक प्रजातंत्र के लिए घातक है। बड़े एकाधिकारवादी अथवा समूहवादी जनता को आर्थिक आजादी से वंचित कर देते हैं। वे मूल्य नियंत्रित करते हैं और मूल्यों, विज्ञापनों तथा विपणन कला द्वारा मनुष्य की उपयोग की आज़ादी को प्रभावित करते हैं। मुक्त व्यापारी कहते हैं कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, जब कभी आप कुछ ख़रीदते हैं, तब आप आर्थिक क्षेत्र में अपना मत प्रयोग करते हैं। उपभोक्ता की पसंद उद्यमी के निर्णयों को संचालित करती है। यह बात उस सीमा तक सत्य है, जब तक ये उद्यम एक सीमा में विकसित होते हैं। परंतु उससे आगे आर्थिक मतदान, साम्यवादी देश में मतदान जैसा ही होता है। मतदान वहां अनिवार्य है परंतु मत सरकारी प्रत्याशी को देना होता है। जब हम पेट्रोल ख़रीदने जाते हैं तो क्या अपने आर्थिक मतदान की आजादी का प्रयोग करते हैं? मूल्य निर्धारण भी वस्तु के उत्पादन या उपभोग पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सुदूर दक्षिण अमरीका शहर में बैठे लोगों को प्रशासनिक निर्णय पूरे करता है।

इसीलिए यदि हम आर्थिक प्रजातंत्र बचाना चाहते हैं तो हमें विकेंद्रीकरण चाहिए। राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने एक बार कहा था- 12.4 करोड़ की आबादी की ‘आर्थिक जिंदगी को लगभग 600 कॉरपोरेशंस नियंत्रित करते हैं, जिनके पास अमरीका के दो-तिहाई उद्योग हैं तथा शेष 1/3 भाग एक करोड़ व्यापारियों में बंटता है।’ (लुकिंग फारवर्ड, 1937)। यही स्थिति इंग्लैंड की थी, जहां कुल आय का आधा भाग 12 प्रतिशत आबादी को और 1/3 भाग 3 प्रतिशत आबादी को जाता है। प्राप्तकर्ताओं को कम आय अधिक परिश्रम से प्राप्त थी और बहुत बड़ी आय बिना श्रम के अथवा बहुत कम श्रम से। इतालवी अर्थशास्त्री लोरिया ने सारगर्भित वाक्य में स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा- ‘कुछ बिना कुछ किए जीते हैं और कुछ काम करते हैं, जीते नहीं।’

पूर्ण आर्थिक प्रजातंत्र

उत्पादन की आज़ादी के लिए जरूरी है कि आपके पास काम हो। यदि करने के लिए काम न मिले तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसी अनुपात में उपभोक्ता की आज़ादी कम न हो, काम के बदले राज्य को अथवा अन्य सामाजिक संगठनों को भत्ता देना चाहिए। सामाजिक सुरक्षा के उपाय और पूर्ण रोजगार आर्थिक प्रजातंत्र के लिए अनिवार्य हैं। आर्थिक शक्तियों का विकेंद्रीकरण ही सारे आर्थिक अधिकार सुनिश्चित करवा सकता है।

प्रजातंत्र के सिद्धांत की रक्षा के लिए विकेंद्रीकरण के साथ-साथ, शक्तियों के पृथक्कीकरण की भी आवश्यकता है। किसी भी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक अथवा धार्मिक संस्था को अपने निजी क्षेत्र से बाहर अधिकार नहीं मिलने चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न प्रकार की संस्थाओं को कार्य करना चाहिए तथा एक क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। राज्य, जो कि एक राजनीतिक संस्था है, उसे आर्थिक दायित्व नहीं संभालना चाहिए और जो अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखते हैं, उनके पास राजसत्ता नहीं होनी चाहिए। धर्माधिकारी को राज्याधिकारी नहीं बनना चाहिए। ‘खिलाफ़त’ और ‘पोप’ का पद सभी क्षेत्रों में प्रजातंत्र के मूल सिद्धांत का विरोधी है। केवल मनुष्य में ही सारी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थाएं समाहित एकीकृत होती हैं, अन्य किसी स्थान पर इन्हें परस्पर आच्छादित नहीं होना चाहिए।

औद्योगिक क्रांति के पश्चात् जिस तरह पूंजीवाद का विकास हुआ है, उसमें अर्थसत्ता का केंद्रीकरण हुआ है और इसके कारण प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से राजनीतिक तथा अन्य संस्थाएं प्रभावित हुई हैं।
इस प्रकार आर्थिक प्रजातंत्र रहित राजनीतिक प्रजातंत्र एक ऐसी व्यवस्था है, जिसने प्रजातंत्र के प्राण हर लिए हैं और यह प्राण रहित शरीर मात्र रह गया है। इस व्यवस्था का लक्ष्य आर्थिक मनुष्य है। इसमें उत्पादन पर बल है और वह भी लाभ मात्र के लिए। पैसा पूजा जाने लगा है और वही मूल्यांकन का आधार बना है। इस प्रकार अर्थसत्ता कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित हो गई है और शेष समाज पर एक ही धुन सवार है, ‘पैसा कमाना।’

समाजवाद इसलिए भी प्रजातंत्र विरोधी है, क्योंकि इसमें सत्ता का केंद्रीकरण राज्य सत्ता में है। एक समाजवादी व्यवस्था में राज्य केवल राजनीतिक अथवा असैनिक संस्था नहीं होता बल्कि आर्थिक संस्था भी होता है। राज्य की आर्थिक शक्ति किसी एकाधिकारी औद्योगिक साम्राज्य की शक्तियों से कहीं अधिक होती है, जिसे उद्योगपति और वित्तपोषक नियंत्रित करते हैं। इस प्रकार आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों के मेल से शक्ति बढ़ जाती है। इस मिलन की घातक शक्ति कई हज़ार गुणा बढ़ जाती है। गांधीजी ने जब यह कहा कि राज्य की शक्ति में वृद्धि को अत्यधिक भय से देखना चाहिए, क्योंकि देखने में भले ही सर्वाधिक कल्याणकारी दिखे (कल्याणकारी राज्य के नाम पर), न्यूनतम शोषण के नाम पर यह मानवता को सबसे बड़ी हानि उसके व्यक्तित्व का विनाश करके पहुंचती है, जो कि सारे विकास का मूलाधार है। व्यक्ति में आत्मा होती है, परंतु राज्य तो आत्म रहित मशीन ही है।

साम्यवाद आत्मघातक है

प्रिंस क्रोपाटकिन’ ने बहुत पहले 1904 में भांप लिया था कि समाजवाद बढ़ा हुआ ख़तरा है, जब उसने लिखा था, “क्या वे युग की मुख्य प्रवृत्ति विकेंद्रीकरण, स्वशासन और सहमति का अनुसरण करेंगे या फिर इसके विपरीत चलते हुए विनष्ट सत्ता को पुनः स्थापित करेंगे।” बाद में 1919 में यूरोप के मजदूरों को एक पत्र में उन्होंने लिखा, “आपको यह बताना मेरा कर्तव्य है कि अत्यधिक केंद्रित राज्य सत्ता पार्टी के लौह नियंत्रण की तानाशाही में साम्यवाद के आधार पर साम्यवादी गणराज्य स्थापित करने का प्रयास असफल होने के लिए अभिशप्त है। हम रूस में किस तरह साम्यवाद को जारी न रखा जाए, यह सीख रहे हैं। जब देश एकदलीय तानाशाही द्वारा शासित होता है तो उसमें मजदूर तथा किसान समितियां अपना पूरा महत्त्व खो देती हैं। यहां (रूस) ऐसी भयंकर नौकरशाही का जन्म हुआ है, जो फ्रांसीसी नौकरशाही, जिसे मुख्य मार्ग पर तूफ़ान से गिरे एक पेड़ को बेचने के लिए पचास लोगों की जरूरत पड़ती है, उसके सामने राई मात्र है। इस प्रकार राज्य-पूंजीवादी समाज का कोई विकल्प नहीं है।

यह व्यवस्था समाज को जो सुरक्षा प्रदान करने का वादा करती है, उसके बदले वह व्यक्ति की सोचने, काम करने और संगठित होने की आजादी छीन लेती है। यद्यपि दोनों व्यवस्थाएं व्यक्तिगत आजादी और मानव कल्याण का वादा करती हैं, परंतु वास्तव में कोई समाधान प्रस्तुत नहीं करतीं और अंततः ऐसी स्थिति पैदा करती हैं, जिसमें व्यक्तिगत आजादी और प्रजातांत्रिक अधिकार महत्त्वहीन होकर रह जाते हैं। वर्तमान में हम केवल प्रजातांत्रिक आदर्शों की रक्षा के लिए चिंतित हैं और बिना संकोच के यह कहा जा सकता है कि इसकी प्राप्ति विकेंद्रित समाज और शक्तियों तथा कार्यों के पृथक्कीकरण से ही संभव है। इसलिए नियोजन का लक्ष्य मुख्य रूप से होना चाहिए —

1. सुरक्षा क्षमता बढ़ाई जाए,

2. राजनीतिक प्रजातंत्र का संरक्षण और परिवर्धन हो,

3. ‘आर्थिक प्रजातंत्र की स्थापना’, जो नागरिकों को काम करने का अधिकार और न्यूनतम उपभोग सुरक्षा प्रदान करके सुनिश्चित की जा सकती है।

-ऑर्गनाइज़र, अगस्त 20, 1960
(अंग्रेज़ी से अनूदित)