जनसंघ ही क्यों ?


दीनदयाल उपाध्याय

पना देश आज अत्यधिक कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है। राष्ट्र जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं और न समाज का ही कोई ऐसा वर्ग है, जिसे आज अनपेक्षित रूप से कठोरतम समस्याओं का सामना न करना पड़ रहा हो। स्वाधीनता के प्रथम झोंके में स्वतंत्रता संग्राम के समय जगाई गई समस्त आशाओं पर तुषारपात हो गया है। भ्रम के बादल अवश्य बंट गए हैं, पर इससे न वास्तविकता का ज्ञान हो पाया है और न संकट का सामना करने की दृढ़ता ही जगी है। इसके विपरीत इससे चारों ओर किंकर्तव्यविमूढ़ता एवं अविश्वास का वातावरण निर्मित हो गया है। जनता का अपने नेताओं पर से विश्वास उठ गया है। वह न तो उसके द्वारा संचालित नीतियों पर ही आस्था रखती है, न उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों पर।

अपने समय की सर्वप्रमुख आवश्यकता उस विश्वास को पुन: प्रतिष्ठित करने की है। यह प्रश्न चीनी आक्रमण या आर्थिक पुनर्निर्माण के प्रश्नों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसके बिना हम कोई भी समस्या हल नहीं कर सकेंगे। इसके लिए कुछ वास्तविक विचार करने एवं क्रांतिकारी क़दम उठाने की आवश्यकता है।

चारों ओर का यह वातावरण कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह तो कांग्रेस नेतृत्व द्वारा निरंतर अपनाई गई नीतियों एवं कार्यों का निश्चित परिणाम है। जनता को सबसे जबरदस्त धक्का उस दिन लगा, जिस दिन देश का विभाजन हो गया। भारत माता की मूर्ति खंडित हो गई और हम देखते रहे।

इससे मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा समाप्त हो गई और राष्ट्रीयता की जड़ पर ही कुठाराघात हो गया। भारत की स्वतंत्रता, राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण के अतिरिक्त और कुछ भी न रही। कोई सैद्धांतिक अधिष्ठान न होने के कारण उससे जनता या राजकर्ताओं में निस्स्वार्थ सेवा एवं अधिकाधिक बलिदान की प्रेरणा का संचार न हो सका। इसने केवल भारत की एकता एवं सुदृढ़ता को ही नष्ट नहीं किया तो भारत की प्राचीन संस्कृति एवं परंपरा के प्रति आस्था को भी डिगा दिया। सरकार ने भी जनता के सम्मुख समाजवाद एवं सेक्युलरवाद का ही प्रतिपादन किया। पर वे नारे मात्र रह गए। जनता में कोई उत्साह संचारित न कर सके। इसके विपरीत उन्होंने ऐसी वृत्तियों को जन्म दिया, जो त्याग, पवित्रता एवं सेवा के स्थान पर व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा एवं अकर्मण्यता को ही बढ़ावा देने में सफल हुए। इसने उन्हें भावात्मक रूप से संगठित करने के स्थान पर सांप्रदायिकता, जातीयता और विघटनवादिता का ही शिकार बनाया।

ये सब बातें केवल संवैधानिक परिवर्तनों से ठीक नहीं हो सकती थीं। श्री जयप्रकाश नारायण तथा अन्य सर्वोदयवादी नेता इस प्रकार के परिवर्तनों का सुझाव दे रहे हैं। कुछ ऐसे ही विचारक हैं, जो केंद्र में मिली-जुली सरकार बनाकर राष्ट्रीय ऐक्ट प्रस्थापित करने की बातें करते हैं। अधिक अधिकार प्रदान कर लोगों में उत्साह का संचार करने के लिए विकेंद्रीकरण के क़ानून बनाए जा रहे हैं। पर इसकी सफलता में भी संदेह है। इससे तो केवल भ्रष्टाचार एवं गुटबंदी का ही विकेंद्रीकरण होगा। परिवर्तन तो सिद्धांत की ठोस भूमिका पर आधारित होना चाहिए।

डॉ. संपूर्णानंद’ ने एक विचार गोष्ठी में इसी तथ्य को इन शब्दों में प्रस्तुत किया है, ‘वर्किंग कमेटी’ ने पहले दिन तिब्बत के बारे में एक प्रस्ताव पारित किया है। उक्त प्रस्ताव में कुछ ऐसी बातों का संदर्भ दिया गया है, जो अनादि काल से हमें प्राप्त हुई हैं और जो हमारी चेतना का एक आवश्यक अंग बन गई हैं। यह संदर्भ उत्साहवर्धक था। मैं समझता हूं कि यदि हम राष्ट्र के नाम अपनी अपील को उन मूलभूत तथ्यों के ऊपर आधारित करें, जिन पर हमारा जीवन संबंधी दृष्टिकोण आधारित है तो हमें अवश्य सफलता मिलेगी। जनता को वह प्रेरणा प्राप्त होगी, जिसकी आज आवश्यकता है। जनता के सम्मुख कोई ऐसी बात रहनी चाहिए, जिसके लिए वे जीने के लिए तत्पर हो, उसे पाने के लिए उत्कंठित हो और यदि आवश्यकता पड़े तो उसके लिए मरने के लिए भी तैयार हो। जनता की साधारण भाषा में इसे धर्म कहा जाता है। जब तक हमारे समस्त कार्यकलापों का, चाहे वे सामाजिक हों अथवा व्यक्तिगत, आधार धर्म नहीं होता, मनुष्य की मूल प्रकृति में कोई परिवर्तन अथवा समाज की आवश्यकता एवं व्यक्ति की आकांक्षा के बीच कोई सामंजस्य बिठाना संभव नहीं होगा।

भारत में सत्ताधारी या विरोधी दलों ने भारतीय जीवन के इस मूलभूत तथ्य की ओर दुर्लक्ष्य किया है। इसी कारण भारतीय जनसंघ को अवतरित होना पड़ा। इस देश को आधुनिकता प्रदान करने के फेर में उन लोगों ने प्राचीन मूल्यों को समाप्त कर देश को शक्तिहीन बना डाला है। सुधार के नाम पर उन्होंने लोगों को एवं स्वयं अपने आपको भी भ्रमित किया है। महर्षि दयानंद एवं महात्मा गांधी भी महान् सुधारक थे। वे कोई सामाजिक कुरीति को सहन नहीं करते थे, पर उन्होंने न तो धर्म की उपेक्षा की और न उसके महत्त्व से इनकार ही किया। इसके विपरीत उन्होंने धर्म के नाम पर लोगों से अपील की और उन्हें सफलता मिली। साधारण जनता की निगाहों में स्वधर्म को अलग नहीं किया जा सकता।

देश की अखंडता, राष्ट्रीयता एवं सांस्कृतिक एकता, यही हमारे राष्ट्रधर्म की आधारशिला है। यही वह आधार है, जिस पर खड़े होकर हमने संगठित रूप से अंग्रेजों का सामना किया। यह एकता बाहरी विभिन्नताओं के होते हुए भी हमारे समस्त इतिहास, जीवन और साहित्य के नस-नस में प्रवाहित होती रही। इसी श्रद्धा के कारण जनसंघ ने कश्मीर के विभाजन का अथवा वहां और शेष भारत के लोगों के बीच न्याय प्राप्ति या मताधिकार के संबंध में होनेवाले भेदभाव का विरोध किया। सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता एवं आदर की परंपरागत भावना के कारण हम प्रत्येक व्यक्ति की उपासना पद्धति एवं विश्वासों की स्वतंत्रता के हामी हैं, पर साथ ही राजनीति में किसी व्यक्ति के धर्म को जबरदस्ती लादने का विरोध करते हैं। राजनीति में हम धर्म के आधार पर अल्पमत या बहुमत को भी मान्य नहीं करते। हम चाहते हैं कि ईसाई एवं मुसलमान अपनी पृथकतावादी नीति त्यागकर अविभाज्य अंग बनें। नौकरी, भाषा, प्रशासकीय नियुक्तियां तथा चुनाव आदि में अल्पमतों के अधिकारों के नाम पर विशेषाधिकार की मांग पर जोर देना यह ‘एक राष्ट्र’ के सिद्धांत के प्रतिकूल है। उनकी दुराग्रही मांगों को मानकर कांग्रेस अपने पार्टी के हित के लिए राष्ट्रीय एकता के मार्ग में रोड़े अटका रही है। स्वधर्मानुसार प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन निर्वाह कर सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि किसी को भी अधिक लाभप्रद नौकरी न दी जाए।

‘सभी को काम’ यही हमारी आर्थिक रचना का आधार होना चाहिए। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि हम विदेशी औद्योगीकरण के तरीक़ों का अंधानुकरण नहीं कर सकते। छोटी मशीनों द्वारा संचालित कुटीर उद्योग ही हमारे लिए अनुकूल हो सकते हैं। उत्पादक वस्तुओं का निर्माण बड़े-बड़े कारख़ानों में किया जा सकता है।

समाजवाद एवं पूंजीवाद दोनों ही विदेशी विचारधाराएं हैं। जनसंघ दोनों को अस्वीकार करता है। जब हम विशाल साहसिक योजनाओं को अंगीकार करते हैं, तभी ये प्रश्न कुछ महत्त्व रखते हैं। पर जब हमारा औद्योगिक ढांचा विकेंद्रित, पारिवारिक स्तर पर स्वयं संचालित अथवा सहकारी तरीक़ का होगा, तब यह सामाजिक संबंधों पर कोई विशेष असर नहीं डालेगा। ऐसी अवस्था में अधिकांश उद्योगों का संचालन राज्य के उचित नियंत्रण एवं निरीक्षण में व्यक्तिगत आधार पर होना चाहिए। राज्य ऐसे उद्योगों को अवश्य संचालित करे, जो व्यक्तिगत क्षेत्रों द्वारा संभव न हों या जिनका व्यक्तिगत क्षेत्रों द्वारा संचालन राज्य की सुरक्षा के हित में न हो। भारतीय समाज रचना में प्रारंभिक इकाई के रूप में परिवार का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। यदि इसे केवल उपभोग की ही नहीं उत्पादन की भी इकाई बनाया जा सके तो इसे पुनः वही महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो सकता है। संगठित पारिवारिक जीवन में भारतीय संस्कृति के मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा भी संभव हो सकेगी।

मैं यहां जनसंघ के कार्यक्रमों की गहराई में नहीं जाना चाहता। उसका सहकारी कृषि का विरोध और देश की परिस्थिति का वास्तविक आकलन किए बगैर तथा अपनी सुविधाओं एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अधिनायकवादी तरीके से की गई सरकारी योजनाओं से सहमत न होना, सभी को ज्ञात है। राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं एकता के मूल्य पर पाकिस्तान एवं चीन के प्रति अपनाई जाने वाली तुष्टीकरण की नीति के हम प्रबल विरोधी हैं यह दोहराना अनावश्यक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उन आदर्शों के प्रति अपनी आस्था दृढ़ करें, जिसे अनेक युगों से जनता ने संजोकर रखा है। केवल ये आदर्श ही जनता को अपनी ओर आकृष्ट कर सकते हैं। दूसरी आवश्यक बात यह है कि लोग अपने दल में आस्था रखें। असंतुष्ट होकर या दूसरों के साथ मिलकर बनने वाले नए दलों का कुछ लोग भले ही स्वागत करते हों, पर इससे जनता में भ्रम उत्पन्न होता है। नेता अपने कार्य के औचित्य को सिद्ध करने में असमर्थ रहते हैं। अभी हो रहे उच्चस्तरीय समझौते मज़बूत नींव पर आधारित नहीं हैं। सर्वदलीय मोरचे अथवा मिली-जुली सरकार राजनीतिक क्षेत्र में अधिकाधिक अव्यवस्था ही उत्पन्न करेगी। इससे जनता का प्रशिक्षण न हो सकने के कारण जनतंत्र को बाधा पहुंचेगी।

सिद्धांत, नीति एवं कार्यक्रमों के अतिरिक्त जनता के लिए दल के व्यक्तियों का भी अलग महत्त्व होता है। कांग्रेस की नीतियों अथवा सिद्धांतों के कारण नहीं, तो कुछ लोगों के ग़लत व्यवहार के कारण आज कांग्रेस बदनाम हो रही है। निराशा के गहन अंधकार में भटकती हुई जनता आज यह समझने को बाध्य हो गई है कि जिन्हें उसने भगवान् समझकर पूजा की, वे निरे ‘पत्थर के देवता’ निकले। सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर से उनका विश्वास उठ गया है। जनसंघ को इस विश्वास को पुनः प्रस्थापित करना है। हमारे कार्यकर्ताओं की अपने कार्य के प्रति अटूट श्रद्धा एवं सिद्धांतप्रियता ही यह चमत्कार कर सकती है। अतः संगठन के संख्या बल को बढ़ाने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए भी जनसंघ अपने कार्यकर्ताओं की योग्यता के विकास पर ही अधिक बल देना चाहता है। अनुशासित दल ही अनुशासित राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

राष्ट्र के सम्मुख अनेक कठिन प्रश्न उपस्थित हैं। साथ ही, अनेक गंभीर संकट देश के भाग्याकाश में मंडरा रहे हैं। पर उन पर विजय प्राप्त करने का कोई सरल मार्ग नहीं हो सकता। राजनीतिक समझौता या व्यवस्थाओं से चुनावों में विजय प्राप्त की जा सकती है। अनेक प्रदेशों एवं केंद्र में भी कांग्रेस को हराया जा सकता है, परंतु इससे तब तक कोई अच्छे परिणाम नहीं निकल सकेंगे, जब तक नए आने वाले शासक जनता को प्रेरणा दे सकने योग्य राष्ट्रीय चैतन्ययुक्त ऐसे कार्यक्रम एवं सिद्धांत प्रस्तुत न करें, जो स्वयं उनके आचरण में प्रकट होते हों।

भारतीय जनसंघ वर्तमान संकट का इसी विधायक तरीके से सामना करना चाहता है और जैसा समर्थन जनता द्वारा इसे प्राप्त हो रहा है। उससे यदि इसका यह लंबा दिखने वाला मार्ग ही कहीं सबसे सरल मार्ग सिद्ध हो जाए तो किसी को आश्चर्य न होना चाहिए।

                                                                                                                                            (-पाञ्चजन्य, जनवरी 25, 1960)