अटल जी : एक अनूठे सांसद

लाल कृष्ण आडवाणी

गर मुझे एक ऐसे व्यक्ति को चयनित करना हो जो अब तक मेरे राजनैतिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा रहा हो, जो पचास वर्षों तक पार्टी में मेरा सबसे करीबी सहयोगी रहा हो, और जिसका नेतृत्व मैंने हमेशा बिना किसी दुविधा के स्वीकार किया हो, तो वह अटल बिहारी वाजपेयी ही होंगे। कई राजनीतिक समीक्षकों ने भी इस बात को माना है कि यह न केवल दुर्लभ है, बल्कि वास्तव में, स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में दो राजनीतिक व्यक्तित्वों के लिए एक ही संगठन में साझेदारी की इतनी मजबूत भावना के साथ काम करने का यह एक अद्वितीय उदाहरण है। मैं, अटलजी के साथ अपनी इस राजनीतिक साझेदारी को अपने जीवन का अमूल्य खजाना मानता हूं और मुझे इस पर गर्व है।

अनुभव ने मुझे सिखाया है कि राजनीति में दीर्घकालिक और अटूट संबंध केवल कुछ साझा उदार लक्ष्यों के प्रति आपसी विश्वास, सम्मान और वचनबद्धता के आधार पर ही संभव हैं। सत्ता के संघर्ष द्वारा संचालित राजनीति की प्रकृति प्रतिस्पर्धी और संघर्ष पर सवार होती है। जबकि एक आम विचारधारा, संस्कारों और आदर्शों द्वारा संचालित राजनीति एक अलग मामला है। जब एक श्रेष्ठ उद्देश्य लोगों के एक समूह को एक साथ लाता है, तो वे छोटे—मोटे मसलों और व्यक्तित्व से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज करना सीखते जाते हैं। बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा, ‘अटलजी के साथ आपकी साझेदारी पचास साल तक कैसे रही? क्या आपके और अटल जी के बीच कोई मतभेद या समस्या नहीं रही?

मैं इन सवाल में छुपी पहेली को अच्छी तरह से समझ सकता हूं, लेकिन मैं इस बात को ईमानदारी से कह सकता हूं कि चाहे दशकों से लोग कुछ भी अनुमान लगा रहे हैं, लेकिन अटलजी और मेरे बीच का रिश्ता कभी प्रतिस्पर्धी नहीं रहा, पर मैं यह भी नहीं कहना चाहता कि हमारे बीच कभी कोई मतभेद नहीं हुआ। हां, कभी-कभी कुछ मुद्दों पर हमारी राय अलग जरूर रही। हमारा व्यक्तित्व अलग-अलग हैं, और स्वाभाविक रूप से, व्यक्तियों, घटनाओं और मुद्दों पर हमारे विचार कई अवसरों पर भिन्न रहे। यह किसी भी संगठन के लिए सामान्य बात है, जो आंतरिक लोकतंत्र में विश्वास रखता हो। हालांकि, तीन कारक हमारे रिश्ते की गहराई को परिभाषित करते थे। हम दोनों जनसंघ और फिर भाजपा की विचारधारा से दृढ़ता से जुड़े हुए थे। यह विचारधारा अपने सदस्यों को राष्ट्र पहले, फिर पार्टी, और स्वयं को अंत में रखने का निर्देश देती थी। हमने उत्पन्न मतभेदों को अपने परस्पर विश्वास और सम्मान को कम करने के लिए कभी अनुमति नहीं दी, लेकिन एक तीसरा और बहुत महत्वपूर्ण कारक भी था: मैंने हमेशा अटल जी को निस्संदेह और निर्विवाद रूप से अपना नेता स्वीकार किया। हमारे सहयोग के शुरुआती दिनों से ही मैंने हमेशा संगठनात्मक और राजनीतिक मामलों के संबंध में अटल जी द्वारा तय किए गए निर्णयों का अनुपालन किया।

मैं अपने विचार प्रस्तुत करता था, लेकिन एक बार मुझे लगा कि अटल जी चाहते थे कि मैं उनके दृष्टिकोण या वरीयता के साथ जाऊंगा। मेरी प्रतिक्रिया इतनी स्वाभाविक हो गई थी कि कभी-कभी पार्टी में मेरे सहयोगियों या आरएसएस के नेताओं ने अटल जी के फैसलों से असहमत होने की मेरी क्षमता या अनिच्छा पर अपनी नाराजगी व्यक्त भी की। हालांकि, इसने मेरे इस दृढ़ विश्वास में कोई अंतर नहीं आया कि अटल जी को पार्टी संबंधित और बाद में, सरकार से संबंधित मामलों में अंतिम बात कहने का अधिकार है। दोहरा या सामूहिक नेतृत्व एकता के लिए बुरा विकल्प है। मैं अपने सहयोगियों से हमेशा चर्चा करता था कि “कोई भी परिवार बिना मुखिया के एक साथ नहीं रह सकता है, जिसके निर्णय निर्विवाद रूप से परिवार के सभी सदस्यों द्वारा स्वीकार किया जाते हो। दीनदयाल जी के बाद अटल जी हमारे परिवार के मुखिया थे।”

यहां मुझे यह भी कहना है कि अटलजी मेरे प्रति एक अनुकूल दृष्टिकोण रखते थे। अगर उनको लगता था कि मेरी सोच एक निश्चित मुद्दे पर क्या है और यदि उस मुद्दे पर कोई गंभीर मतभेद नहीं है, तो वह आसानी से कहते थे कि ‘जो आडवाणी जी कहते हैं, वो ठीक है’। इसके बाद चर्चा के तहत मामला का समाधान तुरंत हो जाता था।

एनडीए सरकार के छः वर्षों के दौरान मेरे और अटल जी के बीच एक गैर जरूरी विवाद को बार—बार हवा दी गई, मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह अटकलबाजी कुछ लोगों के लिए यह एक पसंदीदा मुद्दा था। हालांकि, अटल जी ने संसद के भीतर और बाहर इन अटकलों को खारिज कर दिया था। वहीं इंडिया टुडे को दिए गए एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि “गृहमंत्री एल.के.आडवाणी के साथ आपके संबंध कैसे हैं? क्या भाजपा दो अलग दिशाओं में जा रही है? तो उनका जवाब स्पष्ट था, उन्होंने कहा ‘मैं हर दिन आडवाणी जी से बात करता हूं। हम प्रतिदिन एक दूसरे से परामर्श करते हैं, फिर भी आप अनुमान लगाते हैं। आपका रिकॉर्ड इस बात पर क्यों अटक गया है। एक बार पुन: स्पष्ट करना चाहता हूं कि कोई समस्या नहीं है। और जब होगी, तो मैं आपको बता दूंगा।”

अपने लगभग छह दशकों के राजनीतिक जीवन में, अटलजी ने अपने विचार से न केवल लोगों को प्रभावित किया है बल्कि उनकी तीव्र बुद्धि, हाजिर जवाबी, राजनीतिक दूरदर्शिता और रणनीति के कारण सभी राजनीतिक दलों में उनकों सम्मान की नजर से देखा जाता रहा। उनके अद्भुत व्याख्यात्मक कौशल ने न केवल संसद में बल्कि सार्वजनिक जीवन के हर मंच पर प्रभाव डाला है। उनकी बुलंद आवाज संसद में हमेशा गूंजती रही। अटल जी समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की राय सुनने में कभी हिचकिचाया नहीं करते थे। उन्होंने जनमानस के कल्याण से संबंधित कई बिल संसद में प्रस्तुत किए।
11 अक्टूबर, 2011 को जन चेतना यात्रा शुरू करने से पहले मैंने अटलजी से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद मांगा। मेरी पिछली यात्राओं की तुलना में इस यात्रा में मैंने जो चीज सबसे ज्यादा याद की थी वह थी अटल जी की सक्रिय भागीदारी, जो खराब सेहत की वहज से संभव नहीं थी। लेकिन उनके आशीर्वाद के साथ मैं इस यात्रा पर निकला, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार को खत्म करने और स्विस बैंकों एवं विदेशों में जमा काले धन को वापस लाना था, और हमें इस यात्रा के दौरान पूरे भारत में अभूतपूर्व समर्थन मिला।

अटलजी, मैं और मेरी पूरी पार्टी भ्रष्टाचार और काले धन के साथ ही समाज में अन्य बुराइयों के खिलाफ रही है। अटलजी द्वारा प्रस्तुत बिलों में एक आम आदमी के कल्याण का दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति दिखाई देती है।

लेखक भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री हैं

(प्रस्तुत अंश अटल बिहारी वाजपेयी: ए कंस्ट्रक्टिव पार्लियामेंटरियन नामक पुस्तक की प्रस्तावना से लिए गए हैं)