वैचारिक राजनीति के अग्रदूत


प्रभात झा

जो आया है, उसे तो जाना ही है। क्योंकि जब कोई जाता है तभी धरा पर कोई आता है। विश्व में अभी तक कोई वैज्ञानिक ऐसा नहीं हुआ जो जाने वाले का पता लगा ले कि वह कहां गया? पर यह शास्त्र साफ़ शब्दों में कहता है कि जीवन का सोलहवां संस्कार मृत्यु है। लेकिन मौत इतनी निर्दयी होगी, ऐसा पता नहीं था। पता तब लगा जब एक होनहार वीरवान को असमय हम देशवासियों के बीच से उठा ले गया। ‘अरुण’ तो अभी अपने अरुणोदय से देश को, अपने विचार को आलोकित ही कर रहा था कि मौत ने उसका घर देख लिया। मौत तुझे ऐसा नहीं करना था। जरूर हम लोगों से कोई गलती हुई होगी, अतः उन्हें तुम हमसे असमय छीन कर ले गए।

‘अरुण जेटली’ ने अपने जीवन की लकीर स्वयं खींची। उन्होंने विचारों की प्रतिबद्धता की परीक्षा सन 1975 में ही शत-प्रतिशत अंक से पास कर ली थी। इंदिरा गांधी ने सन 1975 में देश में आपातकाल लगा दिया। उस दौरान अरुण जेटली सिर्फ 23 वर्ष के थे। लेकिन आजादी की दूसरी लोकतंत्र की लड़ाई के वे भी विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में एक सेनानी थे। उन्हें जेल की सींखचों में डाल दिया गया। वे घबराये नहीं। वे बड़े घराने के बेटे थे। लेकिन उन्होंने अपने विचारों की माथा को ऊंचा रखने के लिए इंदिराजी के सामने अपना माथा नहीं झुकाया। उलटे 19 महीने जेल में रहे। विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का इससे बड़ा अनुपम उदाहरण और नहीं मिल सकता।

उनके लक्ष्य तय हुआ करते थे। वे मित्र में इत्र की तलाश नहीं करते थे। यही कारण है कि उन्होंने सदैव मित्रता निभाई। यही कारण है कि बहरीन की धरती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दोस्त को हज़ारों भारतीयों के बीच में पुकारा और कहा कि, “मेरा दोस्त अरुण चला गया।” आज आपको सब कुछ मिल सकता है और मिल भी जाता है, पर एक अच्छा दोस्त मिलना बहुत कठिन हो गया है। राजनैतिक जीवन में तो दोस्त मिलना ही दुर्लभ है। क्योंकि यहां तो स्वार्थ का मेल-मिलाप होता है। यहां का संबंध जिनसे है, वह भी समझता है कि क्यों दे और जो संबंध रखता है वह भी समझता है कि उनसे कब तक सम्बन्ध रखना है।

पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की दोस्ती की मिसाल भारत में हर दिन और हर पल दिया जाएगा। विचारों का लगाव था। स्वार्थों की दोस्ती नहीं थी। यहीं कारण है कि श्रीमती संगीता जेटली को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ़ोन किया तो श्रीमती जेटली ने कहा कि, “आप अपने कर्तव्य पथ पर रहें, और कार्य पूरा करके आएं।” श्रीमती जेटली का यह सन्देश भी दर्शाता है कि अरुण जेटली ने अपने परिवार को भी विचारों और कर्तव्यपथ से जोड़कर रखा था।

अरुण जेटली बेबाक थे। वे प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। वे कुशल वक्ता थे। साथ ही ऐसे प्रवक्ता थे जिन्हे सुनने के लिए लोग टीवी पर आतुर रहते थे।

सन 2003 में दल का निर्णय हुआ कि मुझे दिल्ली आना है। मैं, प्रकाश जावडेकर और श्याम जाजू संगठन के निर्णय से दिल्ली आये। हम लोगों को रहने की व्यवस्था नहीं थी। तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे एक दिन अरुणजी के पास आये और कहा कि दो कार्यकर्ता महाराष्ट्र से और एक मध्य प्रदेश से हमने दिल्ली में दल के कार्य के लिए बुलाया है। उन्हें रहने की व्यवस्था करनी है।

जेटलीजी ने छूटते ही कहा कि ठाकरेजी आपका आदेश! मैं तो अपने 9 नंबर अशोका रोड में रहता नहीं हूं। तीनों की व्यवस्था यहीं कर देते हैं। इसके बाद हम तीनों 9 अशोका रोड में रहने लगे।

धीरे-धीरे वह हम सभी को बुलाते रहते थे और पूछते रहते थे कि कोई दिक्क्त तो नहीं। एक दिन की घटना है। उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि आज तुम मेरे घर चलोगे। मैं हतप्रभ रह गया। वे अपनी गाड़ी में शाम को ले गए। उन्होंने अनेक बातें की और कहा कि मुझे एक संघ के अधिकारी ने कहा है कि तुम अपने संपर्क से पार्टी में आने वाली दूसरी पीढ़ी को आगे लाओ बल्कि उनको गढ़ने का काम करो। उन्होंने उस दिन कहा कि तुम बताओ कि सामान्य कार्यकर्ता मेरे बारे में क्या सोचते हैं? मैंने कहा कि सभी आपके बारे में अच्छा सोचते हैं। इस तरह वे जीवन के हर पहलू पर विचार करते थे। उनकी सरलता और महानता को मैंने करीब से देखा। वे कार्यकर्ताओं के कार्यकर्ता थे। उन्हें शौक था अपने से उन छोटों को गढ़ने का जिसमें भारत और भाजपा की समझ हो।

मैं सन 2008 में राज्यसभा में आया। रेल बजट पर बोलने का उन्होंने अवसर दिया। मैं जब बोला तो मेरी सीट पर आकर कहा कि अच्छा और तर्कयुक्त बोले। बधाई! मन गदगद सा हो गया। इतना ही नहीं, वे ‘कमल संदेश’ का सम्पादकीय नियमित पढ़ते थे। वे मार्गदर्शन भी देते थे। सदन के भीतर हम जैसे लोगों को उन्होंने ऊंगली पकड़कर सिखाया कि आप जब बोलते हो तो भारत देखता है और भारत भाजपा के बारे में सोचता है।

‘अरुण जेटली’ का दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ से बहुत लगाव था। वे कार्यकर्ताओं का अध्ययन करते थे। आज जो भाजपा की द्वितीय पंक्ति की टीम है उसे गढ़ने में उनका बहुत बड़ा हाथ है। वे संसद के दोनों सदनों के गौरव थे। उनके भाषण की जब सूचना मिलती थी तो पत्रकार दीर्घा, दर्शक दीर्घा और सदन की उपस्थिति ही नहीं होती थी, पूरा

सदन आतुर रहता था कि अब अरुणजी क्या बोलेंगे। वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने। उन्होंने उस दायित्व का न केवल कर्तव्यपूर्ण बल्कि देशहित में अनेक ऐसे खुलासे किये कि जो यूपीए सरकार के लिए गले की हड्डी बन गयी। वे तर्कों के साथ तथ्यों को रखते थे। देश के हर प्रांत में आने वाली पीढ़ी से उनका संपर्क रहता था। वे सदैव बोलते थे कि हम अपनी बात स्पष्टता से उचित स्थान पर रखते हैं। दल ने माना तो ठीक। नहीं तो जो दल ने निर्णय लिया, उसे पूरा करने में वे जुट जाते थे।

भाजपा या एनडीए सरकार या मोदीजी की सरकार, जब भी विपक्ष के घेरे में आयी तो उसका अरुण जेटली ने सदैव उसे अभिमन्यु की तरह विपक्ष के चक्रव्यूह को तोड़ा। वे सेंट्रल हाल की शान थे। सेंट्रल हाल में आते ही पत्रकार उनकी ओर चुंबक की तरह खींचते चले आते थे। फिर क्या सब दिल खोलकर बात करते थे। वर्षों तक 9 अशोका रोड में पत्रकारों के सदैव प्रिय रहे अरुण जेटली। उन्हें दल में संकटमोचक कहा जाता रहा। उनके सभी दलों में मित्र थे। उनकी मित्रता विचारों से ऊपर थे। देश में हज़ारों लोग ऐसे थे, जो संघ और भाजपा के समर्थक तो थे, पर स्वयंसेवक या कार्यकर्ता नहीं थे। उन सभी को सदैव जोड़े रखने का काम अरुण जेटली करते थे। देश में एक ऐसा वर्ग जो सीधे-सीधे राजनीति में नहीं होता है, उनके बीच अरुण जेटली बहुत लोकप्रिय थे।

‘अरुण जेटली’ एक व्यक्ति का नाम अक्सर लेते थे। वे थे राजकुमार भाटिया। अरुणजी कहते थे कि मुझे विद्यार्थी परिषद में लाने वाले, विश्वविद्यालय का चुनाव लड़ाने वाले राजकुमारजी ही थे। मैं इन्हीं के कारण परिषद से जुड़ा। वे व्यक्तियों के आकलन में कभी धोखा नहीं खाते थे। खासकर उनकी उन लोगों से बहुत नाराजगी थी, जो राजनीति में अवसरवादी होते हैं। वे ऐसे लोगों से से दल को मात्रा आगाह करते थे।
इतना ही नहीं विश्व से लेकर भारत की राजनीति और उसमें भी भाजपा सहित सभी दलों की, सभी नेताओं की उन्हें जानकारी रहती थी। हमने राजनीति में अनेक लोग देखे। उनमें से विचारों के प्रति ईमानदार और अपने जीवन में मूल्यों और नैतिकता के प्रति ईमानदार व्यक्ति का नाम अरुण जेटली था, हम गर्व से कह सकते हैं। पूरा जीवन पारदर्शिता से भरा था।

हमें अवसर मिला उनके साथ एक नहीं अनेक राज्यों में मीडिया का काम करने का। उनके न्यूज़सेंस के सभी कायल थे। अनेक पत्रकार उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे। वे सबके साथ मित्रता रखते थे, पर उनका सबसे अच्छा ‘दोस्त’ उनकी विचारधारा थी। दिल्ली में जब उन्होंने कार्य शुरू किया और आगे बढ़ते गए तो दिल्ली का एक ऐसा वर्ग जो अपने को ‘एकेडेमिक’ मानता था, वह भी कहने लगा कि अब भाजपा में भी अकादमिक लोगों के आने की शुरुआत हो गयी। वे अपने कर्मों और विचारों की प्रतिबद्धता से आगे आये। वे भ्रष्टाचारी और चाटुकारों से सदैव सतर्क रहते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि ऐसे लोगों की उम्र ज्यादा नहीं होती, अर्थात् हम सभी को धैर्य से काम करना चाहिए।

अरुणजी हम सबको छोड़कर चले गए। वे काया से जरूर चले गए, पर उनकी विचारों की छाया में भाजपा ही नहीं, देश की आने वाली पीढ़ी सदैव पल्ल्वित होती रहेगी।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य हैं)