जनजातीय समाज के समग्र विकास की अभिनव पहल


सुदर्शन भगत

यह सत्य है कि आज भी देश के जनजाति समाज के जीवन स्तर को सुधारने हेतु बहुत कुछ किया जाना शेष है। जनजाति समाज जंगलों में वास करने वाला, कम से कम संसाधनों में जीवन यापन करने वाला, हर परिस्थिति के अनुसार अपने आप को ढाल लेने वाला, अत्यंत सरल और सहनशील मनोवृति वाला समाज है। अपनी श्रेष्ठ परम्पराओं और सांस्कृतिक धरोहर से संपन्न, प्रकृति के अनुसार अपनी जीवनशैली का निर्माण करने वाला प्रकृति पूजक यह समाज देश के 2-3 राज्यों को छोड़कर कमोबेस पूरे देश में अपनी भिन्न भिन्न भाषाओं, परम्पराओं, संस्कृतियों के होते हुए भी, जनजातियों की जीवनशैली के मूल में इन सभी का प्रकृति पूजक होना ही इन्हें एक समूह में जोड़ने हेतु पर्याप्त है।

महानगरों और शहरों से सामान्यत: बहुत दिनों तक दूर रहने के अपने शर्मीले स्वभाव के कारण यह समाज विकास और व्यवसायीकरण से अनेक वर्षों तक दूर रहा। जलवायु परिवर्तन और वैश्वीकरण के इस दौर में, भविष्य को ध्यान में रखते हुए, जनजाति समाज पिछले अनेक वर्षों से अपने विकास के प्रति सचेत होना प्रारंभ किया है। आधारभूत सुविधाओं जैसे सड़क, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं सहित अपने आर्थिक संवर्धन के प्रति ध्यान देना शुरू किया। आवश्यकता महसूस होने लगी कि खेती के समक्ष प्रतिकूल परिस्थितियां और वनोत्पादों का विपणन ठीक प्रकार से न होना इनके आर्थिक संवर्धन में बाधक बना हुआ था। सरकारों द्वारा कोई ठोस नीति जनजातीय समाज को केन्द्रित करके नहीं बनाई गयी थी, इनके सर्वांगीण विकास हेतु रूपरेखा बनाना तो दूर की बात थी।

मैं अत्यंत ख़ुशी और गर्व के साथ आप सभी को याद दिलाना चाहता हूं कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस बात को गंभीरता से लेते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय का अलग से गठन किया, जिससे कि जनजातीय समाज के समग्र विकास का विचार किया जा सके। उनके लिए ठोस नीतियां बनाई जा सकें। उन्होंने जनजातीय मानस को समझा और उनकी आवश्यकताओं पर ध्यान दिया, उनके मार्गदर्शन में ही जनजाति बहुल प्रान्त छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखण्ड अस्तित्व में आये। आज इन राज्यों में भी जनजाति बहुल जिलों को केन्द्रित कर उनके विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है।

वर्तमान सरकार में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में जनजाति समाज के हितों और आवश्यकताओं पर ध्यान केन्द्रित कर विशेष कार्ययोजना के तहत कार्य किया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी चाहते हैं कि वनों में रहने वाला अत्यंत सरल और सहज जीवन जीने वाला यह समाज स्वयं को देश के विकास की मुख्यधारा से भलीभांति जोड़कर अपने बेहतर कल की ओर बढ़ सके। वह भी अपना सर्वांगीण विकास करते हुए देश के विकास में भागीदार बन सके ऐसे सकारात्मक सोच के साथ भारत सरकार देश के जनजातीय समाज के उत्थान हेतु योजनाबद्ध तरीके से कार्य कर रही है। देश का जनजाति समाज, सरकार की प्राथमिकताओं में प्रमुख है।

भारत सरकार यह चाहती है कि जनजातीय क्षेत्रों का तो विकास हो ही, साथ ही जनजातीय समाज का आर्थिक पुनरुत्थान भी तेजी से हो, इसलिए सरकार ने फैसला किया कि देश के जिस ब्लाक में जनजातियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत या उससे अधिक है, ऐसे हर ब्लाक में 2022 तक ‘एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय’ खोला जायेगा। इसलिए जनजाति शिक्षा का बजट भी बढ़ाया गया। हम हर प्रयास करके जनजातीय बालक-बालिकाओं को अच्छी शिक्षा और अच्छे अवसर प्रदान कर रहे हैं। देश के सुदूर गांव/वनों में अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के उद्देश्य से “आयुष्मान भारत” योजना का प्रारंभ किया गया। कैसे स्वास्थ्य सेवाएं सबको पहुंच सकें यही हमारी सरकार का प्रयास है। बेरोजगारी और पलायन से निपटने हेतु भारत सरकार द्वारा “स्किल इंडिया” जैसे सार्थक अभियान चलाये जा रहे हैं।

देश के जनजाति बहुल क्षेत्रों तथा ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोग कैसे आर्थिक स्वावलंबन की ओर बढ़ सकें, यही हमारी सभी योजनाओं के मूल में है, जैसे मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया। इस माध्यमों से आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में द्रुतगति से कार्य चल रहा है। इसके साथ ही मुझे यह बताते हुए विशेष ख़ुशी हो रही है कि गत अप्रैल माह में माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर संभाग के ग्राम जांगला (जिला-बीजापुर) में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वनोपज की खरीद और प्रसंस्करण के लिए केन्द्र सरकार की “वन धन योजना” की घोषणा की गयी। प्रधानमंत्री जी ने कहा – देशभर में वन धन विकास केन्द्र खोले जाएंगे, ताकि हमारे वनवासी भाई-बहनों को वनोपजों का सही दाम मिल सके। साथ ही, प्रसंस्करण के जरिए उनका मूल्य संवर्धन (वेल्यू एडिएशन) किया जा सके। उन्होंने वन धन योजना के साथ-साथ “प्रधानमंत्री जन धन योजना” और “गोबर धन योजना” का भी जोरदार ढंग से जिक्र किया। मोदी जी ने कहा- ये तीनों योजनाएं ग्रामीणों और विशेष रूप से वन क्षेत्रों के निवासियों और गरीबों का आर्थिक विकास करने व उनके स्वावलंबन में मददगार होंगी।

प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत बैंकों में खाता होने के महत्त्व को बताते हुए उन्होनें वन धन योजना के महत्व को बताया, साथ ही उदाहरण देते हुए कहा कि कच्ची इमली को जब आप बेचते हैं तो 17 रुपए या 18 रुपए प्रति किलो की कीमत मिलती है, लेकिन उसी इमली का बीज निकाल दिया जाए और बीज रहित इमली को बाजार में बेचा जाए तो उसकी कीमत 50 रुपए से 60 रुपए प्रति किलो तक मिलती है। इमली बीज का मूल्य भी अलग से मिलता है, जो पौधे उगाने तथा औषधि के लिए प्रयोग होता है। इसकी कीमत भी 50 से 60 रुपये प्रति किलो होगी। उन्होंने कहा-वन धन योजना में लघु वनोपजों के संग्रहण और प्रसंस्करण के कार्यों में लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार भी मिलेगा।

मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी सरकार का यह ऐतिहासिक कदम जनजातीय भाई-बहनों के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लायेगा। एकलव्य विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर जनजातीय युवक और युवतियां जन धन योजना में खाता खुलवाकर बैंकों से आसान ऋण प्राप्त कर सकेंगे तथा अपने ग्राम/मुहल्ले में स्वयं सहायता समूह बनाकर सहभागी प्रशिक्षण और तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर आय वृद्धि कर रोजगार की योजना बना सकेंगे। वे स्थानीय कृषि और वन संसाधनों को कच्चा माल के रूप में संग्रह कर उनसे जनोपयोगी, एंटिक पीस, खाद्य पदार्थ तथा बिक्री योग्य उत्पाद का उत्पादन एवं प्रसंस्करण कर सकेंगे।

उन्हें प्रधानमंत्री जी की घोषणा के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच सकेंगे। सरकार द्वारा उनके उत्पादों को गुणवत्ता परक बनाने और बिना बिचौलियों के संग्रह केन्द्रों और विपणन केन्द्रों पर शीघ्र बेचने और मूल्य प्राप्त करने की सुविधा दी जायगी। उन्हें अपने स्टार्ट अप तथा स्टैंड अप योजनाओं में नये हस्तशिल्प तथा उत्पाद केंद्र स्थापित करने हेतु प्रशिक्षण तथा कच्चा माल सुलभ कराना, उत्पादों का संग्रह, भण्डारण, पैकिंग और सुरक्षा का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस प्रकार जनजातीय युवा शीघ्र स्वावलंबी होकर रोजगार प्राप्तकर्ता से रोजगार प्रदाता बन सकेंगे।

इस प्रकार जन धन योजना से प्राप्त ऋण तथा स्थानीय वन संसाधनों की जोड़ी (दुहरी सुविधा) का बेहतर उपयोग करके वन धन योजना पुष्पित पल्लवित होगी और जनजातीय समुदाय के शिक्षा एवं श्रम का लाभ उनके द्वार (ग्राम में) पर ही मिल सकेगा। इस प्रकार हर जनजातीय ग्राम में समृद्धि और खुशहाली आएगी तथा जनजातीय समुदाय में नया आत्मविश्वास, साहस और बेहतर भविष्य की आशा बलवती होगी। यही देश की वास्तविक उन्नति का मॉडल बनेगा।

                                                                                                     (लेखक केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री हैं)