राष्ट्रात्मा व विश्वात्मा


दीनदयाल उपाध्याय

राष्ट्रीयता यद्यपि मूलत: भावात्मक है, तथापि उसके विरोधात्मक स्वरूप की अभिव्यक्ति यदा-कदा होते हुए भी इतनी प्रबल है कि जन-साधारण ही नहीं, बड़े-बड़े विचारक भी उसकी वास्तविकता को भूल जाते हैं। एक राष्ट्र और दूसरे राष्ट्र के बीच संघर्ष से उत्पन्न युद्ध और उसकी विभीषिका से वे इतने पीड़ित हैं कि उससे बचने के लिए वे राष्ट्र और राष्ट्रीय भावना को ही अवांछनीय और अशुद्ध बताकर समाप्त कर देना चाहते हैं। किंतु यह सिर में दर्द होने पर सिर को ही फोड़ देने के समान होगा। आंखों को वासना का मूल मानकर सूरदास ने आंखें फोड़ ली थीं। आज विश्व के अनेक विचारक सूरदास बनना चाहते हैं। जीवन और आंख का भावात्मक संबंध उन्हें नहीं सूझता।

पारस्परिक संघर्ष का भूत

सृष्टि के विकास की जीवन संघर्षात्मक कल्पना सम्मुख रखने के कारण पश्चिम के विद्वानों को जगत् की हर इकाई संघर्ष करती हुई दिखाई देती है। उनके अनुसार दो या अधिक इकाइयों में मेल तथा तज्जनित नवीन निकाय का अस्तित्व भी अन्य बलवतर शक्ति के साथ संघर्ष करने के लिए होता है। डार्विन ने प्राणिशास्त्र का, हेगेल ने दर्शन का तथा मार्क्स ने इतिहास का विवेचन इसी आधार पर किया। नीत्शे की जिन कल्पनाओं की परिणति हिटलर के नाजीवाद में हुई, उसका मूल इसी सिद्धांत में है। पूंजीवादी अर्थशास्त्र इस संघर्ष और प्रतियोगिता के सिद्धांत को ध्रुव सत्य और वैज्ञानिक तथ्य मानकर चलता है। इसी संघर्ष को सामुदायिक एवं संगठित स्वरूप देकर एक वर्ग को समाप्त कर वर्गविहीन समाज की कल्पना लेकर साम्यवाद चला है। ये सब राष्ट्र को संघर्ष के साधक अथवा बाधक के रूप में देखते हैं। जो राष्ट्रीयता के हामी हैं, वे इसलिए कि वे जो संघर्ष करना चाहते हैं, उसमें राष्ट्रीय भावना उनकी सहायक होती है और जो राष्ट्रीयता को मिटा देना चाहते हैं, वे केवल इसलिए कि जिस आधार पर विश्व संघर्ष की वे कल्पना करते हैं, उससे राष्ट्रीयता बेमेल है तथा हानि पहुंचा सकती है।

संघर्षात्मक विवेचन के आधार पर संघर्षविहीनता कैसे?

पश्चिम के इस दर्शन की उत्पत्ति का आधार ईश्वर और शैतान के बीच चलने वाली ईसाई कल्पना में हो सकता है। शैतान के चंगुल से बचकर ईश्वर की शरण में जाने के लिए जैसे ईसाई संप्रदाय की निर्मिति हुई, वैसे ही रक्षात्मक और विभेदात्मक आधार पर मानव की अन्य संस्थाओं की, जिनमें राष्ट्र भी आता है, सृष्टि हुई है।

जिस सहयोग, प्रेम और एकात्मता की आकांक्षा लेकर ये विचारक प्रयत्नशील हैं, जीवन का यह दर्शन उससे मेल नहीं खाता। संघर्षात्मक विवेचन के आधार पर संघर्षविहीन समाज की निर्मिति नहीं हो सकती। यदि मानव का अथवा प्राणिमात्र का मूल स्वभाव ही संघर्ष है, उसकी प्रत्येक क्रिया की प्रेरणा दूसरे को निगलकर खुद जीने की है, तो हम उसे दूसरे के लिए जीना और प्रेम नहीं सिखा सकते। यदि प्रेम और सहयोग का कोई आधार होगा भी, तो वह किसी प्रबलतर शत्रु के सम्मुख अपनी दुर्बलता और पराजय के भान से उत्पन्न होगा। यह अस्थायी होगा। इससे मानव में सद्भाव, त्याग, सेवा, सहिष्णुता, अनुशासन आदि जिन गुणों की निर्मिति होगी, वह एक नीति के तौर पर होगी। वे उसे मनुष्य या समाज के जीवन का अंग नहीं बना पाएंगे। दूसरों के साथ ईमानदारी के समान ही वे गुण रहेंगे। आपस में ईमानदारी बनाए रखने के लिए इन ठगों को कोई-न-कोई शिकार सदैव अपने सम्मुख रखना होगा। यदि ठगने के लिए कोई न बचा, तो फिर वे एक-दूसरे को ही ठगने लगेंगे। आज पश्चिम के राष्ट्रों के सम्मुख यही संकट उपस्थित है। यदि वे अपने विरोधियों और शत्रुओं को अपने मस्तिष्क से निकाल दें, तो स्वत: ही समाप्त हो जाएंगे। उनकी एकता का आधार टूट जाएगा और यदि वे इसी विरोधात्मक आधार पर चलते हैं तो उनके मानव की एकता और शांति आदि के लुभावने नारे कभी साकार नहीं हो सकते। राष्ट्रीयता उनके लिए सचमुच गले में फंसी हुई हड्डी के समान हो गई है। वे उसे छोड़ भी नहीं सकते और बनाकर रखते हैं तो उसके जाल में अधिकाधिक फंसते जाते हैं।

स्वार्थों का महल

दुनिया के देशों के राजनीतिज्ञ राष्ट्रीयता को समाप्त करने का आत्मघाती प्रयत्न नहीं कर सकते। इसलिए आज तो वे विश्व की एकता की आकांक्षा को केवल अपने-अपने राष्ट्र के स्वार्थों की पूर्ति तथा दूसरे के स्वार्थों के विनाश के लिए कैसे उपयोग किया जाए, इसी का विचार कर रहे हैं। फलतः संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था भी दो शिविरों में बंट गई है। एक-दूसरे से संघर्ष की तैयारी हो रही है। उसके लिए ही प्रजातंत्र और साम्यवाद के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जा रहा है।

नवीन दर्शन चाहिए

यदि हम चाहते हैं कि विश्व संहार और विनाश से बचे, तो हमें इस स्थिति को बदलना होगा। राष्ट्र को बदलने की आवश्यकता नहीं। वह बदला नहीं जा सकता। हमें तो जीवन का दर्शन बदलना होगा। सृष्टि के विकास की सही विवेचना करनी होगी। पश्चिम के खगोलशास्त्री कॉपर्निकस के पूर्व टॉलेमी के ही सिद्धांत को अकाट्य सत्य मानकर चलते थे। तब तक पृथ्वी के चारों ओर सूर्य घूमता था। बाद में सूर्य के चारों ओर पृथ्वी घूमने लगी। आज पश्चिम को ऐसे किसी क्रांतिकारी दर्शन की आवश्यकता है। ईश्वर और शैतान के द्वैत के स्थान पर अद्वैत का ज्ञान कराना होगा। यह जगत् संघर्षात्मक नहीं, तो सृजनात्मक है। बीज वृक्ष के रूप में संघर्ष के लिए नहीं तो अपने स्वत: के साक्षात्कार के लिए प्रकट होता है, उसके जीवन का उद्देश्य किसी का विनाश नहीं तो किसी के लिए अपने आपको समर्पित कर देना है। संपूर्ण सृष्टि एक-दूसरे को सहयोग देती हुई चल रही है। इसका आधार संघर्ष नहीं सहयोग है। पंचमहाभूत इसलिए एकत्र नहीं आते कि उन्हें मिलकर किसी से संघर्ष करना है, अपितु इसलिए कि वह उनकी प्रकृति है, उसी के द्वारा वे सृष्टिकर्ता की इच्छा को पूर्ण कर सकते हैं। यदि हम विकासवादी हैं तो सृष्टि के सृजन का नियम हमें स्वीकार करना चाहिए, विसर्जन या संहार का नहीं। यदि संपूर्ण सृष्टि में, सभी प्राणियों की चेतना में किसी एक शक्ति की प्रेरणा और इच्छा काम कर रही है तो वह निश्चित विधायक है, निर्माणात्मक है, एकात्मक और भावात्मक है, विनाशक और विभेदक नहीं। अभी प्रलयकाल नहीं। सर्जन की वेला में प्रलय का नियम कैसे चल सकता है?

संघर्ष-वृत्ति से मुक्त भारतीय कल्पना

भारत ने राष्ट्रीयता को भी संपूर्ण जगत् और जीवन की विवेचना के आधार पर इसी भावात्मक रूप में देखा है। हमारी राष्ट्रीयता दूसरों से संघर्ष और उनके साथ प्रतियोगिता पर जीवित नहीं रही। समय-समय पर ऐसे संघर्ष आए हैं, किंतु उनकी राष्ट्रमानस पर कोई गहरी छाप नहीं। हां, राष्ट्र-जीवन की विकृति को समाप्त करने के लिए जो घर में संघर्ष करने पड़े, उनका प्रभाव बहुत गहरा है। राम-रावण और महाभारत के युद्ध परायों से नहीं, अपनों के साथ ही हुए। उन्हें हम भुलाए से भी नहीं भूल सकते।

राष्ट्र : भगवती प्रकृति की योजना

हमारी दृष्टि में राष्ट्रों का आविर्भाव किसी ऐतिहासिक संयोग के कारण नहीं, अपितु दैवी प्रकृति की मूल योजना के कारण है। कोट्यावधि मानव राष्ट्र के रूप में किसी कृत्रिम उपाय से एकत्र नहीं आ सकते। उनके जीवन की एकसूत्रता, मातृभूति के प्रति समान प्रेम, समान शत्रु-मित्र भाव तथा उस सबसे बढ़कर जीवन की इतिकर्तव्यता के संबंध में समान भाव किसी बाह्य प्रचारतंत्र के द्वारा उत्पन्न नहीं किए जा सकते । राष्ट्र-जीवन में दिखनेवाली समानताएं किसी अंतर्निहित चेतन तत्त्व की अभिव्यक्ति मात्र हैं। ये राष्ट्र के लक्षण है, कारण नहीं। पश्चिम के विद्वान् लक्षणों को कारण मानकर कृत्रिम रूप से राष्ट्र-निर्माण की कल्पना करते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के उपरांत वर्साय की संधि’ ने यूरोप में ऐसे कई राष्ट्र उत्पन्न करने का प्रयत्न किया। किंतु दूसरे विश्वयुद्ध ने बता दिया कि उनका प्रयत्न असफल रहा। हरिद्वार के एक कुंभ मेले में भारी भीड़ देखकर एक अमरीकी यात्री ने स्व. पं. मदन मोहन मालवीय (वे उस समय जीवित थे) से पूछा कि इस मेले के लिए प्रचार में कितना व्यय हुआ होगा और कौन-कौन से उपाय अपनाए गए। मालवीयजी ने पंचांग खोलकर जिस स्थान पर ‘कुंभ पर्व’ का उल्लेख था, वह दिखाते हुए कहा, ‘हमारा यही प्रचार है, और इस एक लाइन के छापने में क्या ख़र्च हुआ होगा, इसका अंदाजा आप स्वयं लगा लें।’ अर्थात् कुंभ पर्व जैसे अनेक पर्व और त्यौहार राष्ट्र के अस्तित्व के परिणाम हैं, कारण नहीं।

विश्वात्मा और राष्ट्रात्मा

जीवात्मा के समान राष्ट्रात्मा के स्थायित्व एवं उसके विश्वात्मा के साथ अभिन्न संबंधों के आधार पर ही हम उनके विकास की वह धारा निश्चित कर सकेंगे, जो विरोधात्मक न होकर विधायक होगी। सेना की एक टुकड़ी की उन्नति तथा उसके कर्तव्यों की सही पूर्ति संपूर्ण सेना द्वारा निर्धारित योजना में से अपने लिए निश्चित कार्य का योग्यतम संपादन ही है। आर्थिक दृष्टि से विभागीय और क्षेत्रीय तज्ञता (Specialisation) के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले पश्चिम के दार्शनिक ये क्यों भूल जाते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र सर्वसत्ता की ओर से एक विशेष मिशन लेकर पैदा हुआ है। उसका यह मिशन दूसरों के लिए विनाशक नहीं, सृष्टि के परिपालन में सहायक ही हो सकता है। इस कार्य की पूर्ति में अपनी संपूर्ण शक्तियों को लगा देना ही उस राष्ट्र के विकास का सर्वोत्तम और एकमेव साधन है। राष्ट्रों की इस विशेषता को मिटाकर सबको एक मानवता के नाम पर एक ही सांचे में ढालने का प्रयत्न करना जीवन के नियमों के अज्ञान का द्योतक है।

संघर्ष विकृति का परिणाम

अपने-अपने निश्चित कार्य के लिए उत्पन्न राष्ट्र यदि कभी टकरा जाते हैं तो वह उनके विकार का द्योतक है, अपने जीवनोद्देश्य की विस्मृति का परिणाम है तथा मानव के लंबे और विविध इतिहास में अपवादस्वरूप ही है। रोज़ हज़ारों मील दौड़ने वाली रेलगाड़ियों में कभी-कभी होने वाली टक्कर चिंता का विषय हो सकती है, किंतु उससे हम उनके दिन प्रतिदिन के विधायक कृत्य को आंखों से ओझल नहीं कर सकते, न हम यह मानकर चल सकते हैं कि दौड़ने वाली रेलगाड़ियों का उद्देश्य ही एक-दूसरे से टकराना या संघर्ष करना है। टक्कर को रोकने का मार्ग प्रत्येक रेलगाड़ी के संचालक को अपने उद्देश्य एवं संचारण के नियमों के संबंध में अधिक सावधान तथा सतर्क करना ही है। सभी राष्ट्रों को सह-अस्तित्व संभव ही नहीं, अपरिहार्य है। किंतु यह सह-अस्तित्व दो पहलवानों का, जब तक जूझते नहीं, तब तक खम ठोकते रहने का सह-अस्तित्व नहीं हो सकता। सी-सॉ (See-Saw) पर बैठे हुए दोनों बच्चों के सह-अस्तित्व से भी इसकी तुलना नहीं की जा सकती। यह तो इंद्रधनुष के सातों रंगों जैसा सह-अस्तित्व है, जिसमें प्रत्येक अपने व्यक्तित्व को बनाए रखते हुए भी संपूर्ण के सौंदर्य में अपना योगदान देता है। चित्र की प्रत्येक रेखा का अपना महत्त्व है। उनके कारण चित्र है और चित्र के कारण प्रत्येक रेखा की सार्थकता है। जो वक्ररेखा मनुष्य के चित्र में कान की आकृति का आभास देती है, वही अन्यत्र कोई दूसरा रूप धारण कर सकती है अथवा अर्थहीन सिद्ध हो सकती है। हम न तो उसकी वक्रता को मिटा सकते हैं और न उसे संपूर्ण चित्र से अलग करके रख सकते हैं। दोनों में ही उसका विनाश है। राष्ट्र भी जब अपनी इस विशेषता और पूरकता का ज्ञान कर सह-अस्तित्व का विचार करेंगे, तभी एक सुंदर संसार का सृजन कर सकेंगे।

यह तभी संभव है, जब हम संघर्ष के स्थान पर सहयोग को जीवन का सत्य दर्शन मानकर चलें। भारत अपने राष्ट्र-जीवन को इसी आधार पर व्यतीत करता आ रहा है। पश्चिम से संपर्क में आने पर अंग्रेजों का विरोध करने के लिए यहां भी पश्चिमी राष्ट्रीयता के आधार पर विरोधात्मक राष्ट्र-निर्माण के प्रयत्न आरंभ हुए। किंतु उनको सफलता नहीं मिली। इस प्रकार राष्ट्र-जागरण जल बुदबुदवत् ही सिद्ध हुआ। हां, उसने राष्ट्र-मानस में कुछ विकृतियां अवश्य उत्पन्न कर दी है, जिनका हमें शोधन करना होगा। आज दिखने वाली प्रांतीयता, जातिवाद, गुटबंदी आदि की भावनाएं उसी जीवन-दर्शन का परिणाम हैं। उन्हें मिटाने के लिए कभी-कभी एकरूपता थोपने के प्रकृति-विरुद्ध प्रयत्न किए जाते हैं। जीवन की दिशा का ज्ञान होने पर प्राणशक्ति का संचार होते ही ये विघटनात्मक प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी। आइए, हम अपने एकात्मक एवं विधायक राष्ट्र के निर्माण के इस प्रयत्न में जुट जाएं; धारणात्मक होने के कारण यही हमारा और विश्व का धर्म है। इसी से हम कल्याण की ओर अग्रसर हो सकेंगे।

                      (-पाञ्चजन्य, अक्तूबर 31, 1959)