दक्षिण कोरिया से हम कई विषयों पर सीख सकते हैं : मुरलीधर राव


भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव श्री मुरलीधर राव के नेतृत्व में पार्टी के छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने दक्षिण कोरिया का प्रवास किया। यह यात्रा 14 अक्टूबर से 20 अक्टूबर के बीच संपन्न हुई। इस प्रतिनिधिमंडल में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. विजय सोनकर शास्त्री, सांसद श्री उमेश जी. जाधव, भाजपा विदेश मामले विभाग के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. विजय चौथाइवाले, डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी शोध अधिष्ठान के निदेशक डॉ. अनिर्बान गांगुली एवं भाजपा विदेश मामले विभाग से जुड़े डॉ. आश्विन जोहर भी शामिल थे।

गत 22 अक्टूबर को भाजपा राष्ट्रीय महासचिव श्री मुरलीधर राव से कमल संदेश के सहायक संपादक
संजीव सिन्हा ने उनके नई दिल्ली स्थित निवास पर दक्षिण कोरिया प्रवास को लेकर बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

आपके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल दक्षिण कोरिया के प्रवास पर रहा। इस यात्रा का उद्देश्य क्या था?

इस यात्रा का उद्देश्य भारत और दक्षिण कोरिया के बीच पार्टी के स्तर पर बेहतर संबंधों को बढ़ावा देना था।

देखिए, पूर्वी एशिया में गत पांच दशकों में औद्योगिक विस्तार कर एक महत्त्वपूर्ण सफल अर्थव्यवस्था का संचालन करते हुए जो तीन-चार देश गतिशील हैं उसमें दक्षिण कोरिया आता है। दक्षिण कोरिया गत कुछ वर्षों से एक ट्रेड सरप्लस कंट्री के नाते स्थापित हुआ है। निर्यात करते हुए, अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए, लगातार ग्रोथ रेट बढ़ाते हुए, वहां की गरीबी को समाप्त किया, शिक्षा के स्तर को बहुत ऊंचा किया और अपने प्रति व्यक्ति आय भी 30-35 हजार डॉलर तक बढ़ाया तो इस प्रकार के एक सफल-विकसित देश के नाते दक्षिण कोरिया स्थापित हुआ है।

गत कुछ वर्षों में वहां शुरुआत के दिनों में कुछ दिक्कतें आईं, लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाई, लेकिन गत दो दशकों में एक सफल लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाते भी उसने अपनी राजनीतिक व्यवस्था को स्थिर किया। हमारी जैसी आबादी नहीं है लेकिन एक महत्वपूर्ण देश है, तो इस दृष्टि से भारत और चीन के साथ-साथ जब दो सौ वर्षों के बाद एशिया जो महाखंड है ये एक बार फिर से विश्व के अंदर महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के नाते उभर रहा है, फिर से आर्थिक मजबूती को स्थापित कर रहा है। दो सौ साल उपनिवेशवाद के कारण बहुत कुछ खोया था तो ऐसे में भारत से आने वाले दिनों में रिश्ते, राजनीतिक दृष्टि और आर्थिक दृष्टि से बढ़ना चाहिए, ऐसा वहां की पार्टी और सरकार भी सोच रही है। हमारी लुकईस्ट पॉलिसी जिसे हमारी सरकार ने भी मोदीजी के नेतृत्व में इसको और सक्रिय किया तो ऐसे में उस देश को समझना, संवाद को बढ़ाना, रिश्तों के लिए भविष्य की संभावनाओं को तलाशना और रिश्तों के लिए एक प्रकार से नींव डालने का काम, इस दृष्टि से हमारे सात दिन की छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा हुई और यह सचमुच बहुत सफल यात्रा संपन्न हुई।

इस प्रतिनिधिमंडल ने दक्षिण कोरिया में सात दिनों तक किस तरह से प्रवास किए। किस प्रकार के कार्यक्रम रहे?

वहां की जो कोरिया फाउंडेशन है उन्होंने हमारे सारे कार्यक्रमों की रचना की। वहां की सरकार चलाने वाली लिबरल पार्टी, विपक्ष की कंजरवेटिव पार्टी और उसके महत्त्वपूर्ण नेता, ऐसे सब लोगों से व्यक्तिगत और सामूहिक हमारी बातचीत हुई। उनके साथ देश की राजनैतिक, द्विपक्षीय और अलग-अलग देशों के साथ संबंध, उसमें जो जटिलताएं हैं, इन सब पर चर्चा हुई। यहां के एमपी के समान जो वहां की नेशनल असेंबली के मेंबर्स हैं, ऐसे कई लोगों से हमारा मिलना हुआ। वहां नेशनल असेंबली में भी जाकर सब देखा और वहां के अधिकारियों से बात की। उसके अलावा वहां के जो पॉलिसीज इशूज पर सोचनेवाले महत्वपूर्ण थिंक टैंक्स हैं उन सबसे हम मिले। उनकी टोली के साथ हमारी गहन चर्चा हुई।

वहां बुद्धिज्म के लगभग चौदह सौ साल पुराने मोनास्ट्री है, तुंगडो मोनास्ट्री, वहां 20-22 प्रतिशत से ज्यादा आबादी बुद्धिज्म के लोग हैं, ऐसे रिलीजियस नेताओं के साथ हम उनसे भी मिले, उनके साथ हमारा भोजन का कार्यक्रम भी था, वहां संवाद का कार्यक्रम भी हुआ और इसके अलावा हमारे वहां पर जितने इंडस्ट्रीज हैं जो भारत के लिए भी और वहां भी महत्त्वपूर्ण हैं, ऐसे हुंडई, सैमसंग, पास्को और डंकू और इस प्रकार के जो महत्त्वपूर्ण कंपनीज हैं, उनसे मिले। उद्योगपतियों और अर्थशास्त्रियों से भी हम मिले। मीडिया के हाउसेस में भी हम गए तो संपूर्ण समाज के अलग-अलग महत्वपूर्ण लोग हैं, पक्ष हैं, उनसे विभिन्न विषयों पर योजनाबद्ध ढंग से चर्चा हुई।

इसी वर्ष दक्षिण कोरिया ने भारत को अपना ‘विशेष रणनीतिक साझेदार’ घोषित किया। दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंध किस तरह से विकसित हो रहे हैं?

देखिए, 1991 के उदारीकरण के बाद उस समय की सरकार ने लुकईस्ट पॉलिसी की घोषणा की थी। हमारे संबंध बढ़ाने का कार्य शुरू किया था। अटलजी की सरकार के समय भी इसकी गति तेज करने का काम किया। अब विशेषकर मोदीजी की सरकार आने के बाद दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति और यहां के प्रधानमंत्री दोनों के बीच गर्मजोशी के रिश्ते हैं। आपसी विश्वास भी है, आपसी केमिस्ट्री बहुत अच्छा है। ऐसी मान्यता वहां के लोगों में है। यहां पर सरकार में स्पेशल डेस्क भी हुआ है, निवेश के बारे में और इससे संबंधित मुद्दों के बारे में समयबद्ध ढंग से इसके फॉलोअप करने की व्यवस्था यहां की सरकार ने किया, जिसका बहुत अच्छा रिस्पांस वहां से है।

वो ट्रेड सरप्लस कंट्री होने के कारण उनके पास निवेश करने के लिए बहुत अच्छी पूंजी हैं, उसका उपयोग करने की मंशा हमारे मन में है और आर्थिक दृष्टि से यहां कई जगह पर वो निवेश कर रहे हैं, निवेश बढ़ा है। हम दोनों के बीच में जो ट्रेड है वो 21 बिलियन डॉलर का अभी हो रहा है। हमारे ट्रेड डेफिसीट ज्यादा हैं। आने वाले दिनों में ये ट्रेड डेफिसीट कम करने के लिए उनके देश में कृषि क्षेत्र, स्पेस रिसर्च, सुरक्षा, कृषि, ऑरगेनिक फूड्स और कल्चर, ऐसे क्षेत्र में भारत आगे बढ़ सकता है, इसकी संभावनाएं हमें चर्चा में मिली। हम केंद्र सरकार को भी रिपोर्ट देंगे, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी देंगे, तो जो भविष्य की संभावनाएं हैं उन संभावनाओं को और मजबूत करने के लिए हम आगे बढ़ेंगे।

हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि दक्षिण कोरिया भारत के लिए रोल मॉडल है, ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए कहा कि हम लगभग एक ही समय में गुलामी से मुक्त हुए। हम हुए 1947 में और वे 1945 में। उनका पार्टिशन हुआ। हमारा भी पार्टिशन हुआ। दक्षिणी कोरिया-उत्तरी कोरिया करके पार्टिशन हुआ। हमारा भारत और पाकिस्तान के नाते। इतने नीचे से गरीबी से, पिछड़ेपन से, निरक्षरता से, सारी समस्याओं से जूझनेवाला दक्षिणी कोरिया इन सब चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आज एक औद्योगिक और प्रौद्योगिक संपन्न देश बन गया है। विपुल मात्रा में पूंजी अर्जित कर प्रति व्यक्ति आय बढ़ाते हुए आधारभूत ढांचे को पूरे देश में गांव-गांव में फैलाया। पांच दशकों के अंदर वह दुनिया के अग्रिम देशों की पंक्ति में आ गया। प्रवास के दौरान अध्ययन पश्चात् हमें लगा कि  दक्षिण कोरिया से कई विषयों पर हम सीख सकते हैं, इसलिए भारत के भविष्य के लिए दक्षिण कोरिया रोल मॉडल की तरह है।

वहां के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और आम आदमी में भारत के प्रति किस प्रकार की सोच है?

देखिए, बुद्धिस्ट लोग वहां आबादी में 20-25 प्रतिशत है। किंतु मूलत: सांस्कृतिक दृष्टि से वो बुद्धिस्ट देश है। इसका प्रभाव आज भी उनके ऊपर है। आज मजहब के नाते कुछ लोग बदले होंगे और कुछ लोग नास्तिक होंगे, उसके बाद भी नास्तिकता के नाते एथिइज्म डिक्लेयर्ड उसके नाते सबसे ज्यादा 50 प्रतिशत वो लोग होंगे, फिर भी वहां बुद्धिज्म की संस्कृति का प्रभाव दिखता है। इसके रहते हुए वहां के आमलोगों में बुद्धिज्म के लिए भारत के प्रति, हालांकि बुद्धिज्म चीन के माध्यम से गया, आदर का भाव है। भारत उनके लिए मातृभूमि है, बुद्ध की जन्मभूमि है, कर्मभूमि है, तपोभूमि है, इसलिए हमारी सांस्कृतिक महत्ता को वो समझते हैं, इसलिए भारत के प्रति उनके मन में खूब सम्मान है।

इसके अलावा भी हमने देखा कि वहां ऐतिहासिक कुछ और चीजें हैं। वहां सरनेम किम रखने वालों की आबादी भी 8 से 10 प्रतिशत है। मान्यता है कि ये किम सरनेम रखनेवाली जो आबादी है, उसका संबंध अयोध्या से है। यहां की राजकुमारी शताब्दियों पहले वहां गईं और वहां के कारक डायनेस्टी स्थापित करने वाले महाराज के साथ उनकी शादी हुई और सुरीरत्ना नाम से वह इतिहास में अंकित है। आज उसको वहां हियो के नाम से जानते हैं। उनके वंशजों का ही सरनेम किम है। तो इसके आज भी भावनात्मक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं। इसलिए भारत के प्रति आदर है। यही नहीं, जब दक्षिणी कोरिया के ऊपर जापान का राज चलाता था तो उसे लेकर रवींद्रनाथ टैगोरजी ने कविता लिखी कि पूरे विश्व में दक्षिणी कोरिया फिर से लैंप ऑफ द ईस्ट के रूप में पुनर्जाग्रत होगा और विश्व के अंदर एक अच्छी भूमिका निभाएगा। यह लोगों के मन में है। वे लोग इसे भूल नहीं पा रहे हैं और इतना ही नहीं, हमारी भारतीय सेना की भी यशस्वी भूमिका है।

उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच में जब युद्ध हुआ, सिविल वार हुआ, 1950 से 53 के दौरान, तो इस दौरान मेडिकल मिशन के रूप में आर्मी के लोगों ने जो सेवा की, उसके कारण लोगों में आज भी बड़ी श्रद्धा है। इसलिए हमारे लोगों के प्रति, हमारी संस्कृति के प्रति और हमारे देश के प्रति वहां के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं सबके मन में सम्मान और विश्वास, ये दोनों चीजें मुझे देखने को मिली। भारत में मोदीजी की सरकार इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में दुबारा जीतकर इतनी बड़ी संख्या में वोट प्राप्त सत्ता में आई, इससे वो अचंभित हैं और इसे सम्मान से देखते हैं। इसलिए मोदीजी के प्रति वहां पढ़े-लिखे लोगों में और सामान्य लोगों में एक आदर का भाव है।